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भेमराज-श्रीकृष्णदासः
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स॒द्रक ओर प्रकारक
खेमराज श्रीकृष्णदास,
माजिक-“श्रीवेङ्गटश्वरः? स्टीम्-प्रेस, बंबर.
पुनयुद्रणादि सर्वाधिकार '“श्रीपेङ्केश्वरः' यन्त्राल्याध्यक्षाधीन हे ।
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क्षण-
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विद्रमहेमनीटधवलच्छायेसुखसखी
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शख चक्रमथारयविदयुगछ दस्तेददन्तीं भजे ॥ १॥
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स्मिकाम\गायन्रीं वरदांभयाङ्कं रकश शरंकपालं
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र सयुक्ता विद्रुम (मृगा) सुवणं, नीलम ओर स्फटिकके
छविवाटे तीन तीन नेवारे [ पांच ]` सुखोसि युक्त)
‰ चन्द्रमसि सुशोभित रत्नसुकुरवाटी, चौबीस अथं ओर
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५ पाञ्च शख चक्रं ओर दौ कर्मलोके ( दश ) हार्थो धारण ‡
करती हुईं श्रीगायजी देषीके में भजता हूं ॥ १॥ ^
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ॐ (१) दवीभागवते । स्क० १२।अ०३। श्ो° १०। )
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छ (४) गायक्ीसगणध्यानम् ।
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(१) उवेतवणा समदि कारोयवसना तथा ।
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ठेवतेएविटेपनेः पृष्पेरलङ्करिश्व भृषिता ॥ १ ॥
आदित्यमण्डलस्था च व्रह्मरोकगता थवा ।
अक्षसूत्रधरा देवी परद्यासनगता शुभा ॥ २॥
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गायत्री दवी,. सखेतवणै, रशी वल्लक धारण कयि
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हए, उवेत चन्दन ओर खत पर्ष्पोकी माला ओर् सव
(र)
भूष्णोस भूषित, तथां खत रुद्राक्ष माडा धारण क्रेयं
हए, पद्मास्नसे स्थित सूयमण्डट अथवा वब्रह्मटकमें
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् सस्कृतम् । ।
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अ (१) हृदयकमलमध्ये दोपवद्रदस्तार प्रणवसम- #
;, यमतक्ब योभििध्यान गम्यम् ॥ हरिगुरुशिवयां
‰ सवभरतस्थमेकं सछृदपि मनसा वै ध्यायते य
५
।
‡ सं सुक्तः॥ १॥
++ र । + + ४ 1"
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भाषा।
हृदयकमलं शुद्ध दीपरिखके ञ्पोतिके समान स्वै- ध
(4 वेदोका सारश्च) ग्रवणरूप) तकैनारदित योगि्ोके ध्यान- $ 8
द्वारा जानेन योग्य विष्णु, गरू, दिवस्वरूप, स्वभूतेमे ७
चेतन्यरूपप्े विराजमान, अद्वितीय परबरह्यरूप गाय्रीका 0 ५
मनक जा पु€्ब एक वारभी ध्यान करता है वह जीव
पृक्त टै॥ *॥
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ध ( १ ) गायत्रीहदये । °
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५ अधिकः पाठः| ५,
9 ८७ पृषे स्कान्दीयपुतसंदितोक्तमन्छध्याख्या % |
# विद्यरण्यस्वामिङृता । (
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# ` अन्तर्यामितया स्थितो यो देवः स नोऽस्माकं
। धियो वुद्धिर्ध्न्ञानादिषु भचोदयास्रेर्येत्"“ । चर- ¦
(> भ्रण इत्यतस्मादेटबाडागमः । तस्य देवस्य &
‰ योतमानस्य स्वयपरकाशचिद्रुपस्य सवेभाणि-
कि ता श ` अ ` श „प
4 स्थितिसंहारकारणतया प्रलिद्धं वरेण्यं सर्वप्राणि
¢ सेव्यं भर्गो भर्जनालापस्य भर्जकं स्यन्ञानादिल-
५ क्षणं स्वमायाशंक्तिवदान शिवरुद्रादि संज्ञापन्नं सूय- 4 ॑
¢ मण्डलमध्ये तघ्त्ेरकलेनावस्थिते वाङ्मनलातीत-
& मीदग्विध यस्परं बरह्म तद्वयं धीमहि ध्यायेम । तदे- |
= वाहमस्मीति जानीयमित्यथः। “ध्ये चिन्तायाम् 4
५ इत्यस्मष्टिडिः छान्दसं रूपम्, तदुक्तमाचर्यैः न्ये ^.
4 चिन्तायां स्मृतो धातुर्नष्पन्नं धीमहीत्यतः” इति। ् |
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^ विद्न्नेषु सवेवेदसारभरतब्रह्मासमेक्यवोधक- %
६ गाचतनीमन्तरो विषैतोऽस्ति । तस्य सवैकमांदावलु- {1
£. छाने तदकरणे प्रायश्चित्तं चान्यस्मिन्ननाधेकारं
> शाखरेवु निर्दिष्टम् । पनरपि यत्सवेश्चतिस्ष्रतीति- ॥
& हालपराणम्नगरतीनां ससारदःखनिवृत्तिपुधकनि-
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त्यकेवल्यानन्दावासिषयोजनमस्ति तस्केवदेतन्मः
त्रेण मङविक्षेपावरणनिरसनपवेकेण लिद्धं भवतो
स्युच्यते । “यज्ञानां जपयज्ञास्मीति भगवद्वी-
तोक्तवचनात् सवेयज्ञेष॒॒निदेनपुरषसरसाध्यखा-
द्विसादिरहितत्वाचच यज्ञस्याधिकखम्; पुनः ५.
“सर्वेषां जपसृक्तानां गायत्र परमो जपः” इति. ~
पराशरोक्तवचनात्सवेजपसृक्तेषु साक्षाद्रह्योपास्त- ष
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¢. नलाद्वायन्राजपस्य परम् । पुनः "गायन्तं ्
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(4. 344 ४ १
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५ (2). सस्कतभमेका ।
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नात् सवाल्कृष्टगायत्रजपन सवमहापातिकाद्- ८
ॐ मटखाभमहनन भवाति ।
शरस्य चन्तनाव्पयकोपासनया पविक्षपानरसन
भवति । तथा च तत्स्वरूपलक्ष्यभृतनद्यत्मेक्य-
% ज्ञनेनावरणक्षयो मवति । णवं जीणे स॒क्तिष-
$° ~>)
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£
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1
मानन्दखक्षण सायुज्यकेवेस्यपदं भवति
& विद्याबीजविखसितसषुष्टयवस्थायाम्-अन्ञानकाय-
£ विख्याद् दुःखनिवृत्य।त्मकं विषयानन्दीत्छरष्ट £
¢ सकरजनानुस्रतसखमस्ति । तस्मादपि केवल्यपदे
अज्ञान नव्रात्तपतकानन्दागीन्तरूप द्यत्यन्तोर्छष्- 4
परञ्च यदव॒विव्यथा करोति ¢
१
(* तम सखन्मवात
061. 44900
तथा ''अस्षावादिव्यो
बरह्म" “यं आत्मा जगतस्तस्थषश्च 'येाऽसावा-
तिवन्धकानि नरयन्ति । ततोऽथंधम्मादिपुरुषाथ- ¢
चतुयसारभ्रतसालोक्यादिचतुष्कसारतमं पर-
। यद-
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चै च 2 + चै च # म; च ॥1 ;; २१ ११+१ 7 ~>) ¢
४ श्रद्धया तदेव वी्य्यवत्तरम्भवति ॥” (छान्दग्य०) &
ध “तजपस्तद्थमावनम् ।” ( योगस ० ) “वेदस्या-
(; ध्ययनं सव ध्मंशाखस्य चापि यत् । अन्ञातार्थ
~ त तत्सर्वं तषाणां खण्डनं यथा ( व्यासः ) “स
+ वेदपाठमात्रेण सन्तष्टो यो भवेद् द्विजः 1 पाटा ¢
५.
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त्रावसायी तु पङ्के गोरिव सीदति ॥ योऽधीत्य %
मः
4 विधिवद्धेषो न वेदाथ विचार्यत् । स सान्वयः ¢
शद्रसमः पात्रतां न प्रपद्यते". (मनुः) “योऽधीतेऽ- ‰
हन्यहन्येतां गायर्थ/ वेदमातरम् । विज्ञायार्थ छु
बरह्मचारो स याते परमाद्खातम् ˆ ( कमेषु )
जपस्याभ्यन्तरे उयाख्या स्मत्तव्या मनसा एजः ©
स्मरणात्सवपापानि प्रणद्यस्ति न संदयः ॥ ध
५
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विश्वासभक्तिजननं मन्त्रेयञ्ज्ञानमुत्तमम् । तस्मा
(==
* दथं विजानीयाययलेन जपछ्कद् द्विजः” (भारश्नज)। ४
£ इत्यादिवाव्येभ्यस्तद्पासनायास्तदथन्ञनसध्य- ६
( त
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वात् तदथज्ञानस्यावद्यकत्वम् । अंतश्तद,धिका-
"41444416:
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भृतं प्रधाना सस्च
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ष ` भषाभ्रामक् ।
५
,१{ विदरलर्नोका गायत्रीमन्व विदित दही दहै जो चारों
,{ वर्दोका सार हे ओर जो जह्य ओर जीवाटमाकी एकताका
¶† बोधक है । शसखरमि एसा ठेख है कि वेदिहित सव
¡ कर्मके आरस्भमे गायत्री मन्त्रका अनुष्ठान दोतारे एसा
1 न कंरनस प्रायाश्चत्त (पप) हाता हे आर अन्य सत्कम
५ करनेका अधिकार नही रहता है । पुनः समस्त श्यति
' स्मरति, इतिहास, पुराणादिका लक्ष्य यदह रै कि संसार-
डःखकी निवर्त ओर नित्य केवट्यानन्दकी प्राप्त हा, यह 4
कंवर गायत्रोमन्तर द्वारा री परीभूत दो सकता है क्यो- 4
किं गाय्नी मन्बका आश्रय लेनेस रीऽ मल, क्षिप ओर न
आवरणका, नाश होता है ( यज्ञानां जपयकज्गाऽस्मि ) 4
यज्ञेमिं भ जपयज्ञ द, भगवान् श्रीकृष्णके इस वाक्यके
नुसार सब यज्ञं हिसा तथा द्रव्यव्ययके अभावके 4
{ ८ कारण जपयज्ञका है महत्व अधिक रहै, पनः ““ सर्वेषां «+
(4 जपसृक्तानां गायत्री परमो जपः ” सव प्रकारके जपोमि ८
< गायत्रीजप श्रेष्ठ हे पराशरयुमके ऽस वचनकं अनसार 44
(4 साक्षात् ब्रह्मकी उपासना होनेके कारण गायञ्जी मनका ‰
५५, जप सब जवै श्रेष्ठ है 1 पनः “गायन्तं यत्ते यस्मा- ©
‡ त्पातकादुपपातकात् ' इत महाम व्यासजीके वचनके '
$ अनसार जो गाय्जी मन्धका गान ( जप ) करता 8 ५
4 उस) रक्षा यहं मनर पातक (महापातक ) ओर उपपात- 4
न
1010000
म ५५
र <~ . १७ ^
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प 90165
कसे करता हे । इस्त षचनफ अनुसार सर्वश्रेष्ट गायजी-
ध जप दारा सव प्रकाशक महापातकादि मलोका नारा होता ।
& त्था “ असवादित्यो ब्रह्म? ( यह सूय्यं जो आका-
\, मण्डलम उदय हाता है आरे अपने परकाशते अन्धशा-
रका नाद करता है वश बह्म हे) “ सूये आला
„ जगतस्तस्थुषरच'" ( सूय्यं चर आर अचर दानो परका-
रकां खणका आवा हे ) ' य।[ऽपावादष्य पुरुषः
सेसःवहम् ” ( जो परुष सूय्यमं हं वही महू)
‰ इत्यादि तियं द्वारा यह प्रतिपादित रोता है कि गाय-
जीमन्याथं स्प जो तेजामय पुरुष सूय्येषण्डछ तथा
| 4 दृदयकमटमें विराजमान है उसक। चिन्तन करनेसे
= नाद होता है । गायत्रीमन्ञमं भी यदी उपा-
4 सना प्रतिपाद्य है । तथा उस्र तेजोमय पुरुषके लक्षा
= रपरूप अथात् ब्रह्मत्मेक्यका जो ज्ञान होता हे उससे
५
५ १२) भाषाभमिका |
0 नाश्च होता, इन मरातिबन्धकोके क्षय देनेसे
& पुरुषाय चत्टयमं सारभूत मोक्षकी ओर सक्ति चतष्टयमं
4 अतिश्चष्ठ परमानन्दरूप सायुज्य कैवल्यपदकी प्राप्ति होती
= हे। सव टखोगाका यह साधारण अनुभव हे कि अविद्या- 4 ॑
= चीजविंरसित सुष्राप्े अस्थाय अत्नानके काके रोप
५ होनेसे से दःख निनरृतति पूषक पिषयानन्दसे उत्कृष्ट सुख
होता है उससे भी अधिकं कैवल्यपद प्राप्त हाने पर॒ अज्ञान-
निश्ाशिवू्वंक अत्यन्त उत्कृष्ट अक्षय सुख होता हे । निश्चय
4 करकं जो सत्कमं अधक्ञान तथा श्रदधाधूवेक किया जात्ता है
# वह अधिकतर बण हाता दे ( छन्दाय > ^“ „उस
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+ क बति हाता ह जसे कोचडमं फी ह गऊ " (मन्न) 4
८ ^“ जो विम विधिपूैक वेदका अध्ययन करता हे परन्त॒
= वेदक अर्थो नकौ विचारता बह वंदसटित ञदरके वलय च
५ ६ आर् छुपा्रताका नहा प्राप्त हाता (मनु) जो ५।
न्च बलचार। प्रतिदेन वेका कारण इस गायत्रीके अर्धका सु
(0
र ध ( कूमुराण >) “दिज्ञको उचित है किं जपङ्क समय :
वैः
मनम मन्त्रार्थं 1चन्तन करते रहं क्योकि अथक स्मरणसे 44
{4 वधी विश्वास ओर भक्तिको उतपन्न करनेवाल। ह, इत
लिये जप करनेवाटे दिनक यलपुकं अथं जानना '
उचित ई" ( भारद्वाज ) इत्यादि बाक्यसि स्पष्ट है |
= ^^ ६५
1५ गायन्न[ मरके अथक ज्ञान भी आर्यक ३
क्या फं मत्रके अथज्ञान विना उपासना साध्यनहीं ३।
८ इस कारण अधेकारो पुरुषा उपकारकं छिये ("गायती
नाथं भास्कर नामक ग्रन्यकं। रचना दुई है । इस ८
सै
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८ ग्रन्थम भिन्न भिन्न सम्भदायोके मतेंका उदेव न करके
,† केवर अनेक अलभ्य शति, स्मृति, पुराण भाष्यादि- र
ब ग्रन्था सारपरत प्रधान अथं लेकर यथोचित स्थानम ९।
रखादेया हं । इति । ४
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| ‰ १ मंगलाचरणम् १
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२ गायत्रीमह खम्
३ गयत्रीव्रहयैक्यम्
9 कारभेदेन गायत्रीनामानि
८, गायत्रीनामाथः
६ वणोश्रमिणां तन्मन्त्रभेदाः
७ ब्रह्मचारिगृहस्थयोः
८ वानप्रस्थादीनाम् _
2 गायत्रीप्रणवक्तयोगक्रण हतुः
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छ १० गायत्रीमन्त्रः
4 ११ गायत्रीपदच्छदः
& १२ अन्वय की नि
4. १३ प्रणवमदत्वम् दि
| {4 १४ प्रणवस्य ब्रहमबोधकत्वम्
१५ प्रणवफटम्
८ १६ प्रणवनामानि
१ १७ पदाथः
= १८ मात्राभदाः श
८ १९ मात्रभिदेप्वग््यादीनां व्याख्याः
| २० प्रकारान्तरेण मात्राधीः
¶ कः २१ व्याहृत्य
२२ भूः-पदा्थः .... 4;
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ध २२ मवः-पदाथः १ २६४ ४ 2
&& २४ स्वः-पदार्थः ५. „. ४
(\ २५ तत्-पदाथः {६.४ #
२६ सवितुः-पदाथः ५ ॥ क ८
२७ वरेण्यं--पदाथः १ ,... ५७
२८ भगेः- पदार्थः ४. 4.८
२९ देवस्य-पदार्थः द 4: ७०
३०-धीमहि- पदाः 5 15 हं ७३३
२१ धियः-पदा्ः 4 = ७६.
३२ यः-पदाथः, + ५ .... ७७
ररे नः- पदाथः तः ७८
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ॐ ३४ भरचोदयात्-पदाथः म 4 ७९ &
२९ ब्रह्योगियाज्ञवरक्योक्तगायत्रीभत्रा्थ; . ८० &
$ ३६ भरद्राजस्मृदयक्तगायत्रीभाष्यम् ,
{4 १ „ „ 2." ८ & ६,
५ ३७ अगस्त्योक्तररोकः 1 त ।
‡& २८ ब्ृहप्पाराशरोक्तर्लोकः =... मा 4
८ २९ सूतसंहितोक्तमत्राथः 4 धि वी 19
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~न" च
४० आग्चेयनिवोणतन्तोक्तमत्राथः , , ह ८८
४९ उन्वटभाष्यम् &१। र ९०
४२९ सायनभाष्यम् 1.५ ॥ ९२
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१ ४२ रावणभाध्यम् ४ ० च ्
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४६ विचारण्यस्वामिकृतमंत्राथः 1४२ 1
५
४७ मद्रोजिदीक्षितविरचितभाप्यम् त ५... ५
४८ वरदराजभाप्यम ४ 2; ९९ 1
४९ तारानाथतकेवाचस्पट्युक्तगायत्रीवाक्याथः , .-.. १०७
५० विष्णुधमेत्तरोक्तमेत्रवणोर्थः 4 4:
( ५१ निप्कषेः ५ 8 „प
9 (तावाः `. ` गिलक ९०९
र ५५३ गायन्नीजपमहत्वम् ८ 1,11.1
$ ५४ जपमेदः तत्फलश्च 44 4; ११.
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ध 01719217 1141, ध
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मङ्गलाचरणम् ¦ &
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न संस्कृतम् । ५.
नुद (~ ट
£, (१) ध्याता जह्य प्रथममतयु प्राणम्रूरे नदन्तं ¦.
१)
£
दष्टा चान्तः प्रणवसुखरं उ्याहतीः सस्यगुक्त्वा \
यत्तद्रेदे तदिति सवितर्बह्मणोक्तं॒वरेण्यं तद्ध- ^
गाीख्यं किमपि परमं धाम गभं पपश्चे ॥१॥
भाषा
प्रथम विश्च जद्यकों ध्यानकर, भीतर इदयवायुके
भूटस्थानमें अव्यक्त शब्दकां करते इए, आदम ( ४)
1
न्नर
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१५ 111 (4
~ ~ध; ~ ~ 94
तव व्याह्यति ( भशरुषः स्वः) को भटे पकारसे कह ( तत् ) <;
यद ओर (सार्वतुदरण्यं ) एसा वेदम अह्माजीसे कथित
को देखकर ( भर्गो ) भगे नामक कोर अनिपैचनीय तेजके ^+
शरणमे मे मात होता हूं ॥ १॥ ५
( १ ) साम्बपञ्चाशचिकायाम् |
ध वि ~> नि & 4 ¢ ~~ 2. -~ = क्ष निः त-स
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न (२) गायत्रांमन्ताथभास्कर ५
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४ सस्करुतम् । 8)
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2
यन्मण्डलं ज्ञानघनं
"^ जिगुणात्मरूपम्॥ समस्ततेजोमयदिव्यरूपं पुनातु ¦
८ (१) यन्मण्डर उयाधिषिनाशदक्चं यदहग्यजुः-
€ सामस सम्प्रगीतम् ॥ प्रकाशितं येन च भुवः
~ स्वः पुनातु मां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ २ ॥
त्वगस्य चरक््ययृज्य
गध इनत >
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+. मां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ ३ ॥ |
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४। ज € क~ = ०५ = क | ९ अ > ५.१ ७4 श
. जो सूयेमण्डठ उाधिर्योके विनाश करने समथ हैजो 4
4
3
41
› या
, ऋक, यज ओर साम्बेदमे सम्यक् प्रकारस गान सयाग
जमसे भुवः सवः प्रकारैत हता ८ तत्सवदवरण्य-
म् ) वह सूयदवका वणेनीय तेजवाछा मंडट मुञ्चे पावे
च <©. <© 1 4
अकरै ॥२॥ ५
‡ जो मण्डल निविड ज्ञानरूप) अगम्य, तैलोक्यपूज्पं, ध
4 व्िशुणालमस्वरूप ओर समस्त तेजामय दन्य सरूप है, श
4 4).
4 वह सूं देषका वणेनीथ तेजवाला मण्डल सृक्षे पित्र
~ करे ॥ ३॥ ४
ध ( १) महाभारते । &
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५ ६. ।
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. ६ => = श =: | ४5; ‰ =/ + : क. क. &- निः ठ; =] ~ 6
"+ (२) गायन्ना छन्दसां मातेति ॥२र
ध गायजामटह् चवम् । (३) १
% त न मभ भभ भभ भमी भीमः त ;
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भायत्रीमहक्वम् । |
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-) ८ ६३.
(= ९,
‡ (१) गायत्री छन्दसामहम् ॥ १ ॥ सक
> +> 4 >
==> 9)
2, > >> 4.8
# + (१) 1
{ (३) नास्ति गंगासमं तीथं न देवः केरावात्परः।
„. गायञ्यास्तु पर जप्यं न भूतं न मविष्याते ॥ ३॥ ८
+ भूभुवः स्वरिति चेव चतुरविंशाक्षरास्तथा । 4 ९
गायन्ना चतुरा वदा आङ्करः सवमव तु ॥2॥ ~.
। मभनणनक + च
(\, छन्दोम गायी छन्द्मे द ॥ १॥ क
९. ~. =. == ह]
, गायत्री वेदोका आदि कारण है ॥ २॥ ~
| गंगाके समान् कईं तीथ नही हैः केशव भगवानूसे परे ‰
| कोर देवता नहीं हैः गाथत्रीसे परे कोह जपन हुदै न
\- होगा ॥ ३॥ | ५
५ भूवः स्वः यह तीन महाव्याहतियां ओर चौबीस ५
{\ अक्षरवारी गायन्नी चारों वेद् स्वरूप दै ओर निस्संदेह
(-\ ओंकार सवेरूप है ॥ ४ ॥ |
त व ~= --- --~ 0
\{ (१९) भगवद्रीता अध्याय् १०।३५।
4 (२) महानारायणोपनिषदि १५१
४ (२३, ब्रृ०° यो० याज्ञ॒° अण० १९०।१०; २।७९; ४।९६।
त) -&) वि र 44 4 वि न> वि प नाच विः 4) र ०
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¢> ¡ ` &>+< - ` 3५ ६
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४; गायत्री पन््राथभास्करः । ध
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धः
संस्कृतम् 1 ध
यथा मधरु च पुष्पेभ्यो घ्रृतं दुग्धाद्रसार्पयः । 4
एवं हि सवेवेदानां गायत्री सारसुच्यते ॥ ५५
त
(१) त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादम्पादमदृदुहत्।
तदिव्य॒चोऽस्याः सादि याः परमेष्टी प्रजापतिः॥६॥ \
(२) अष्टादशसु वियासु मीमां साऽतिमशैयसी। ' |
ततोऽपि तकंदाच्ाणि पुराणं तभ्य एव च ॥ ७ ॥ ‰
+ ततोऽपि धर्मंशाच्रणि तेभ्यो गुवीं श्ुर्तिद्धज । 4
& ततोऽप्युपानेषच्दष्ठा गायत्री च ततोऽधिका ॥
च दुमा सर्वमन्त्रेषु गायत्री घरणवान्विता ॥ < ॥ ‹
< भाषा) ४
$ जसे एखोका सार मधु, दूधका सार घृत रसक्ा सार.
दूध है हसी प्रकार सव वेदोंका सार गयी मंन कदा 4
¢ जाताद॥ ९॥ १
, परमेष्टी पजापति ( बद्या ) ने तीन ऋचावार। मायन्नीके 4.
‰ तीनों चरणीको तीना वेदोसे सारष्रत निकले द ॥६॥
५ अटारहों .वरियामं मीर्मासा अतिगे है तरसे भी,
{८ न्यायङाखर ओर न्यायशाखसे पुराण श्र हँ ॥ ७ ॥ |
र हे द्विज ! तिससे भी प्रष्ठ धमशा हे ओर उससे भी श्र
¢ वेद् दं वेदसे श्र उपानेषद तिमे भी गाय्ी म्र शष्ट 1
हे, प्रणवयुक्त यह गायत्री सवं म्मे इठेभ ३ ॥ ८ ॥
४) ~. ~~ --------~--- ~~~ ~~~ ~ -- ~~ -- --~- ~ ----------- -------- ` - --
(4 ( १) मनु० अ० २। शो° ७७,
(२) व्र° सन्ध्याभार।
त ~ ~ 86 ६1 शनि प?
४4८ (न कः र {9 2 4 8 ~, ०५ २ | ॐ ~ (४ ४ प र ध
> ५९ ~ ~
© यन्त नेनि
> अर 9 ~ 6 ४ ८५५५9
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न, =+ = यु ४ ~ = ज ~ = =
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गाय्ीसहच्म् (९ )
संस्कृतम् । ६।
५ (१ )एकाक्षिर परं बह्म ्राणायामाः परन्तपः।
{ साविन्यास्तु परन्नास्त पावन परमं स्रुतम् ॥९॥ +
पाठान्तरम्--( मोनाव्सत्ये विदिष्यते ) ध ्
+ (२) तदित्युचःसमो नास्ति संत्री वेद चतुष्टये ।
‡ सवें वेदादच यज्ञाश्च दानानि च तर्पासि च ॥ 4
समानि क्या ्राहु्र॑नयो न तदित्युचः ॥ १०॥ ।
¢ (३) सवेषां जपसृक्तानासरचाच यज॒षां तथा । ‡
\ सारा चेकाक्षरादीनां गायत्री परमो जपः ॥११॥ ५
< जादा । ‰&&
4\ एकाक्षर (ॐ) परब्रह्म है, भराणायाम परमत्प रै, 4
\ गायत्रीसे परे को$ मत्र परमपवित्र नौ है । तया सत्य &
५ बोलना मौनते श्र है ॥ ९ ॥ ९
(, चारो वेदम गायश्रके समान कोड मन्म नं है। 4
८ निरोग कृते है, कि गायश्रीके एक करके समान सेवेद्, 4
८.4 सवयज्ञ, सवेदान ओर सवे तपस्याएं नहीं ह .॥.१० ॥ 1
(1 सव जपसुक्तमि ऋग्यजुःसामवेदा आर एकाक्षरादि म~ ^
॥ न्मे गायत्री परम जपे) १९५ |
॥
क
4 (१) मनु° अ०२। शो ° ८३। अत्रस्म्ृ° अ०२।छो०११। ५
(1 (२ ) विरवामित्रः। ्
4 (२३) त्र° पाराशरस्मृ०° अ० ५।शो०४।
| 8. द त ©] -
८09
न \
(द्) गायजीमन्वाथंभास्करः
४. 1१ क # त~ >~ "श्र ~+ +न न = = > ॥ शिली रज 1}; क 1, क > कै 4 > जक ~~ >^ 1, भ्न क +४
संस्कृतम् ।
भावा ।
( १ ) योगियाज्ञवल्क्य °|
(२) ब्रु° पाराश्र्० ।अ० ५। श्छो०१६।
( 9 ) देवीभागवते कन्ध १२। अ० ८ इटो ९।
7 ~. ~ ~ 0, 2..4> -< ~:
4444-9:
४
~+ + 4# ~न र += +१ न १४ २ 4 ) "अकृ ॥ + "श्व ५४ 1 एङि 1 कभ +~ क ॥
ध (१)साङनंरचचतुरोवेदानधीव्यापिसवाङ्मयान्। `
त सावित्री योन जानाति बृथा तस्य परिथ्रमः॥१२॥
+ ` ()गायन्री चेव वेदाश्च ब्रह्मणा ताता पुरा!
^ वेदभ्यर्च सहस्रभ्यो गायञ्यतिगरीयस ॥ १३ ॥ .
(३) सवेवेदसारभूता गायतयास्तु समचना । .
४ बह्यादयोऽपि संध्यायां तां ध्यायन्ति जपन्ति च।१४॥
(ॐ) गायच्युपासना नित्या सर्ववेदः समीरिता । `
{ यया विनाखधःपातों बाद्यणस्थास्ति सवैथा।१५॥
{4 स्वर तथा अङ्क सित चारों वेद् पद्ने परभ जो गाय
| मन््रको नरह जानता है, उसका परिश्रम निष्फर हे ॥ १२ ॥
९ पूवं काट्मे ब्ह्याने गायश्री ओर बेदोको तीटा तो "4
सदो वेदासे भी गायन्नीका पटा भारी पाया ॥ १३॥ |
(=) गायद्चीका आराधन सव वेदाका साररूप है सन्ध्याकाले `
$ ब्रह्मादिक भी तिसका ध्यान सहित जप करत ह ॥ १४॥ `
$ सर्वं वेदाम गायत्रकिी नित्य उपासना वर्णित टै, जिसके
॥ विना सवं प्रकारसं ब्राह्मणाकां अधोगते दाता ह॥ १५॥
( ३ ) देवीभागवते ्ं° ११। अ०१६। रलो ०।१५।
न ~ #ि + ट ~
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ॐ 166 = ~= ~“ लद -
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५4 4८27-2
४ ~ श्रै | 4: 8 {4 हः ग द्वि ॥
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\ (९) भायन्नीमाच्रनिष्णातो ष्डजो सोक्षसवाप्नु-
९
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(८ ० @ __ (~ (~ = @
¢ (२) गायच्याः प्रम नस्त (दवि चहे च पाव- +
< च = & >~ ४६
{। नम् । हस्तत्राणप्रदा देवी पततां नरकाण॥ १७
| (२)किं वेदै; पठितैः सर्वैः सेतिडहासपुराणकेः ।
| साडगेः सावित्रहीनेन न विप्रत्वमवाप्तुयात् १८
भाषा।
केवर गायनी माच्रकी उपासनास द्विज मोक्षो प्राप्र
होता है ॥ १६ ॥
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रस रोक तथा परलोकमं पवित्र केरनबाखा गायश्चीसे
परे कोई मंत्र नरीह क्योकि नरकरूप समुद्रमे गिरत
¢ शः इएका यह् गायन्री हाथ पकडकर षचातां हे ॥ १७ \
अङ्कसरित स्वं वेद् तथा इतिहास पुराणादिकोके पट्नसे +
॥ क्या हआ जो गायक्रीम्रकी उपासनासे रीन है षह
| ५ ब्राह्मणत्वको नहीं पराप्त होता है ॥ १८ ॥
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(८ ) दे ० भा० स्क ९१२९।अ० ८ ररो० 2. ©| रु
(२ ) राडखस्प° अ० १२ रंखो° २५५ ।
(३) व° पराशरअ० ५४) ^
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(# ८८) गायनेमन्त्राथभास्करः । 4
1 का
छ (नि न नि मि म मजनि मिम मी मी र पिं र मि मी 4
क ५
४ सस्ङ्ृतम्। 4
द =+ ~ =. ।
६ (१) न ब्राञ्णो वेदपाटाल्न शाखपटनादपि । `4
॥ दृड (> 02 (- - ण् किः कि 1.३
4 दव्याल्काङनस्यासाद्भद्यणः स्याह्िज।- ~
। १ ` |
¢ <न्यथा ॥ १९॥ ॥ |
(२) गायन्यास्त॒ परन्नास्ति शोधनं पाप-
9 कमणाम । महाव्याह्ति्ंयुक्तां धणवेन च
संजपेत् ॥ २० ॥ ४
4 (ई)गायन्री यः परित्यञ्य चान्यमंत्रसुपासते । 4
.{ न साफल्यमवाभोति कल्पकोटि शतेरपि ॥ २१ ॥
५ भआषा। ४
| वद् आर् शसक पड़नकस्त भना बह्म नह् हां सता ल ५4
4 चि्ाठ गायत्रीकी उपासनासे बह्यण कहा जाता ई 4
‡ अन्यथा द्विजौ रहता है ॥ १९ ॥ क
+ गायभ्ीकी उवासनासे परे पापकर्मेकि शोधनेकं लिये कोई 4
4 मच नरी है अतः प्रणव तथा महाव्याह्ति सहित ग।य्रीका ^
प कर् ॥ २० ॥
गायत्रीको छंड़कर जो दूसरे मत्र उपासना करता ¢
वह शतकोटि कल्पतक भी सफ़टताके प्राप्त नरह कर 4
कता ह॥२१॥
८ १) व° सन्ध्याभाष्ये |
( २ ) सम्बतं स्¶० \ इखो० २१५
¦ ( २, व° सन्ध्याभाष्ये। ु
† 8 904 20 0424742 00
स 0.9
{न भ्न
1 गयजामहत्वस् । (९)
र न म भमी भीम मी मभीरभिरे मीम म गमिरमीपमि
॥ सर्छतम् । ध
पष एव भंजो दविजंसखस्ंपादकोपनयनसंस्कारे ४
उपदिर्यमानो गरुमंत्न इत्यच्यते, सयवंरीया-
= अन्द्रवरीयाश्च सवै राजान इममेव -संत्रं 1
शुचयो भत्वा नित्य जपन्ति स्म. यथा महाभारत ~
अतृशासनपवैणि अ० १५० उरो ७८ युधि- ¢
ॐ रं भति भीष्मवाक्यम् । सोमादित्यान्वयाः ¢
९ सवं राघवाः कुरवस्तथा । पठन्ति शुचियो निस्य `
१ सावित्री परमां गतिम् ॥ श्ररामचन्दकतेकनित्य- }4
(4 सन्भ्योपालनं ( गायत्रीसंत्रजपः ) तु वारमीकीये ५
ध वहुषु स्थटेषुपवणितीमति षिदितरेवासित ॥२२) ५
भाषा ९
यही भ्र दिजल-तगादक्त-उपनयनतस्कासमे उपदेश +
\ करिया गया शुरुभत्र कहा जाता है। इता भन्न ध
सूभवशी तथा चद्रषञ्ली राजन्पगग पिच हकर नित्यं जपा 1
करते येजेसा किं ( मह।भारतके अवुशासन पमे १५० (ज
< १ क .4 -- ए
रः = = <
{{ अध्यायके ७८ वें इरोकम >) युयिष्ठिरके प्रति ष्म कहा
१ हे) कि सूये ओर चन्रवंशके सष कोई तथा रर ॐ5- ।
ध वंशी ( विेष ) पवि नित्य परमगल
ध सावित्रीको जपा करते है (श्वीराप्रचन्धजीका किप स॒न्ध्ये- भ ),
पासन ( गायक्नीमत्रजप ) वाटभकय रामायणम कर एकं
| स्थम वाणत ह इति ॥ २२॥ |
श
18
( १०) गायनामन्जाधमास्ङरः |
संस्कतम्
(१) नात्रतोयसम दान न चाहस्रापर तपः ।
न साविन्नीसमं जप्यं न उयाह्यतिसमं हतम् ॥२३१
भाषा ।
अन्न ओंर जके समान दान, आ्सिके समान तप
ध साविन्नीके समान जप ओर व्याहतिसमान कोई आदति
(१ नदीदै॥२३॥ र
| गायत्रीब्रह्यक्यय् ।
संस्कृतम् ।
(२) ब्य गायत्रीति- ह्य वे गायच्नी ॥ ६ ॥
(३) गायत्री परमात्मा †॥ २॥
4 6 (४) गायच्री परदेवतेते गदिता बह्येवं
^ चिद्रूपिणी ॥ ३॥
न भाषा ।
। £ ब्रह्म दी गायन्नी हे ॥ १॥
गायज्नी परमात्मा है॥ २॥
छ गायत्री सवके परे देवता ओर चेतन्यरूपिणी बह्म रहै
$ (१) चूतसदितायां यज्ञवेभवखण्डे (अ०६ इटो ०२००२६९)
( २) शतपथत्राह्मणे।८।५।२।५।एतरेयव्रा० अ० २७ ख०५
( ३ ) गायत्रीतच्तवे । इको ९ ।
(9 ) गायत्रीपुरश्चरणप० ।
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संस्कृतम् ।
(शयो वदासि गायन्नीं तत्त्वरूपा ज मयीम्)!
यया परकाद्यते बह्म सचदानन्दखक्चणपर् ॥ ९ ॥
(२) असावादित्यो चह्य ॥ + ?
(३) सयं आद्मा जगतस्तस्थषदच ॥ -& ॥
(४) गायना का इदं सवेम् ॥ ७॥
(५) गायनी वा इद सवभूत यादेदं !केच<))
भ्याषा )
तच्रूपिणी वेदमयी गायत्रीको भे कहता हँ, जिससे
५ सच्चिदानन्द छक्षण ब्रह्म म्रङाक्ित रोता हे,अथाौत् ब्रह्मका ज्ञा-
न होता हे ॥४॥
यह परयकष सू यदेष ब्रह्मल्प दै ॥ ५ ॥ #
यह सूयं भगवान् चर अचर खषटेका आत्माहं ॥&॥
यह सव खृष्टे गायत्रीरूप हे ॥ ७ ॥
यह सपार जो ऊछ है वह सष गायश्रीरूप हे ॥ ८॥
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( १ ) यायत्रीतक्से इलो० १)
( २ ) महावाक्योपनिषदि
(३ ) सूर्योपनिषटिि ।
( 9 ) चसिंहपूवेतापनीयोप ° ४।२।
( ५ ) छन्दोग्योप ° ३।१२।९। ्
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४६) सश्करतम् ¦
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८) न भिन्नां भ्रतिप्ेत भायत्रीं बह्मणा सह । |
ई सौऽहमस्मीययुपालीत विधिना येनकेनचित् ॥ ९ ॥
&; (रो्देवस्य सवितुस्तस्थ धियो यो नः प्रचोदयात् +
् भर्गो वरेण्यं तद्रह्य धीमहीर्यथ उच्यते ॥ १० ॥
& सपरभं सत्यमानन्दं हृदये सण्डर्ऽपिं च । {|
| ध्यायस्पेत्तदिस्येतन्निष्कामो मच्यतेऽचिरात् ॥१९१॥ “†
(स यश्चायं परुषो यश्चासावादिव्येस एकः+इतिश्चुतेः) |
भाषा । ८
गायत्र ओर ब्रह्मे भद् नहीं है, चाहे जिम किती मरका-
रसंहा (बह) मरह, यह उपाकप्तना क८॥ ९ ॥ ४
उस प्रकाशमान संविताङा वणेन करने योग्य तेन जो ह~ {
९। बु!दके। रणा करता € वह ब्रह्य ६ उस न ल्प 4 ब
करता दर दसा कथन दे ॥ १० ॥ |
भकाशचसर्हित सत्पानन्द् खर्प व्रह्मक ददयम वा सूर्यम. 4
ह त
( १ ) व्याप्तः।
(२ ) विदवामित्रः ४
94. 4.44.
& ण्डलं ध्यान करता हआ निष्काम गायभीका जकर तो
4 दीघर भववन्धनस दट जाता है ॥ {९ ॥ 4
& (सप भरते ददम जौ आतरूप पुषठषहे ओर ज। 4
& सूयमण्डलम परमातसरूप पुरुष हे वे दानां एकरूपे)
0 ( ;
१
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५ ` गायत्रीजदयक्यम् । ( १३) 4
|] 9 1. ५
व् संस्कृतम् । प
~ 9 ० ^ ^
(१) गायञ्यास्यं बह्म गायच्यनुगतं गायनाः.
मुखेने्तम् ॥ १२ ॥ ४
( # स् १4 ` €,
# (२) गायत्री पत्यग्ब्रह्मक्यवोधिका ॥ १३॥ 4
1? (ड)प्रणवव्याहतिभ्याख गाय्या जितयन च । ` `
९ उपास्यं परमं बह्म आत्मा यच्च अरतिष्ठितः ॥ ९४ | +,
ध (9) परव्ह्यस्वहपा च नवाणपद दायेन ॥ त
‰ ब्ह्मतेजामयी शक्तस्तदधिष्ठात्देवता ॥ १५॥ ~
वुः <,
। भाषा। । =
[६ ॥ . 1
४ ५. नामक ब्रह्न म[वन्नःम व्प्रापक गायञज्जा नामस सः
4 वेणित दै ॥ १२॥ १ ध
( गायत्री जीवात्मा ओर ब्मकी एकताका बोधक दै॥९३॥
. पणव व्याहते ओर गायत्री इन तीनोदयारा परब्रह्म उषा-
|; सना करने यौग्य हे जिस ब्रह्मे आत्मा स्थित है ॥ १४ ॥
¢ %
- ब्रह्मरूपा गायनी मेोक्षपद् देनेवाटी है ओर बह्मतेजमयीं
क जै + नेः ¢, ज क. +^
दाक्ति रै वह गायत्री मनकी अधिष्ठात्री देवता हे ॥ १९५
ध.
८
( ( १) छान्दोग्य० चकरभाष्ये प्र० ३ख० १२म० ५। ्
4 ( २) रङ्करभप्य । 4
$ (३) तारानाथक्ृतगा० व्या० प्र° २५।
$ (9 ) दवीभाग० स्कं° ९अ० शरठोक ४२। ५
कि, ४ 4
94444044 थ.
ऋ ~ - ~> 6.
= ॐ £ व 1. & (~ ॥ ह > ५ 1 ~ ^ ह. > ट ६ > ह वु 8 ४१५
ज
ड ( ९८ ) गायत्रीमन्ताथभास्फरः । ध
क!
| सर्छृतम् । 4
(१) ओद्कारस्तत्परंव्रह्म सावित्रीस्यात्तदक्षरम्१६ , |
२ (२) गायत्रा तु परं तच्वं गायनी परमा ^
4 गतिः ॥ १७ ॥ ५
(4
(३) गायच्येवपरो विष्णुगोयञ्येव परः श्लिवः ॥ 4
=
ह
{~ ५
~+ गायञ्यव परो बह्मा गायव्येव त्रयी यतः ॥ १८ ॥ 4
| (४)सवारमना हि सा देवी सवभूतेषु संस्थिता
५
क
^ गायत्री मोक्षहेतुर्वं मोक्षस्थानमलकन्नणम् ॥ १९ ॥
भाषा । |
ॐ ओङ्कार परव्रहमह्प दै ओर गायत्री मी नाश रदित ब्रह्म च
ॐ ह ॥ १६ ॥ €
गायत्री परमतत्व ओर परम गति द ॥ १७ ॥ स
ॐ । "ध १4
ॐ गायत्री ही दूसरा विष्णु, दुसरा रिष आर दतरा बला
+ है क्योकि गायज्री तीनों देर्ोका खरूष हे ॥ १८ ॥ ८
द वही गायश्री देवी स्वसरूपसे सै भृतोमे स्थित है ^
८ ओर गायगीही मोक्षा कारण तथा अलप मुक्तिका स्थान 4
. ३॥ १९ ॥ |
नि
# ८१) क्रमपुरण उ० व्रिभार अ० १४। इलो° ५५।
1 (२) ब्रृहत्पारा्चर स० अ० ५ रृखो० ४।
क (र) व्रहत्सन्ध्याभाष्ये |
क्क (४) ऋषिश्गः।
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( १५)
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काटमदन् गायन्या नामान् । |
भ संस्कृतम् । 8
दन [अर ९१२ ॐ = ^, र = क क
६ (गायत्री नाम पूवां सावित्री मध्यमे देन ॥ {|
£ सरस्वती च सायाह सेव सन्ध्या तरिषु स्पृता५९; ;,
=
६ भाषा ॥ स
1 पातःकार्ठे गायत्री) मध्याहमें सावित्री तथा सायङ्कार्मे +
सरस्वपी नाम हं वश गायत्री तीनों सन्ध्रामे वणित ह ॥ १॥ "4
| गायत्रीनामार्थः । ६
(1 संस्कृतम् । ध
ध् स [9 ४ |
{ (२) तद्य्रयाश्खायते तस्माद्वायज्ची॥१९॥ 4 र्
३ [कर = ह. ^~ १
+$ (३) गायन्री गायतेः स्ुतिकमेण इति ॥ २ ॥
र भाषा ।
४ ^ [कन = ब 3 9
वै गायत्री जिस कारणस मआर्णोकगे रक्षा करती हं तसि
{4 कारणे उसका गायश्री नाम हे ॥ १॥
+ गान ओर स्ततिकमपं गायत्री नाम दे ॥२॥
0
4.
(१ ) व्यास्तः।
ध (२) ब्रहदारण्यकण० ५।१४।४।
$ (२) निरुक्तौ नेषण्डके काण्डे । १अ०३पा० ३ ख०। &
ककः
=, क, | (न द ~ 03 2 १ (4 नी (क 2
४.2. 4 19 & 1 1.4
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कः ˆ (१६. ) ` गायत्रमन्त्राथभास्करः। प
५ कि 444 0 ^ 744 र रि 02 श)
~ ४ ध
£ सस्कृतम् । ध
>,
५
| (१) प्रतियहान्नदोषाचच पातकादुपपातकात् ॥ (4
` गायत्री भाच्यते तस्माद्वायन्तं त्रायते यतः ॥ ३॥
(२) सवितदयोतनात्सेव साविन्नी परिकीतिता।। ५
++ जगतः प्रलवितृत्वात् वागरूपत्वारसरस्वती ॥ ४ ॥
१
ॐ (३)गायानज्छष्यान् यतचरायेत्कायं प्राणांस्तथैव च।
¦ प्रकाशनात्सा सवितुवाग्ूपत्वात्सरस्वती ॥ ५॥ |,
{ भाषा) ध
निक्त कारणे जप करेनवांरकी प्रतिग्रह, अन्नदेष पातक «५
$ ओर उपपातकोसे रक्षा करती है तिस कारणे गाय्जी (व
44 कही जाती है ॥ ३॥ ५1
ॐ प्रकाञ्चकरनसे आर जगत्रकं उत्पन्न करनक कर्ण उसा
(\ गायच्ीका नाम साविध्ी इजा ओर बाणीरूप हासे 4
सरस्वती इ ॥ ४॥ ८५. „ ५
¢ जिसकारण जप करनेवारके शसर अर प्राणका रक्षा |
(4 करती दै तिसकारण गायज्री नाम ई, मकारा दानसं सावित्रा व
५ अर वाग्रूप हानसे सरस्वती नाम है ॥९॥ 4
(१) व्यासः--याज्ञवल्क्यः। :
@ (२) व्यसः। धु
$ (२३) अधिपुराण अ० २१६ । उलो १-२। थ
रि
|
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4 ४ $+ > - ~~ -4~- ~ 4 [~ ई
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वणाश्रमाणां गायच्रीमत्रभदः । ( १७) 4
4
सस्कृतम् । |
(१ प्राणा गया इति पोक्त। खायते तानथापि वा॥ &
त ¢ 1
(२) गयान् प्राणान् त्रायते सौ गायनौ ॥६॥ 4
( ३) चतुर्विरत्यक्षराणां सच्ेन गायत्रीखन्वस्क- †
तयापीयं गायत्रीव्य धीयते ॥ ७ ॥ ॥
भाषा। 3
प्राणका नाम गयहे तिस प्राणकां रक्षा केरनके कारण
पः
गायज्री नाम दआ ॥ जा गय अथांत्-प्राणोके रक्षा ४
करती रे वह गायत्री दे॥ ६1
चोषीस अक्षरास निमित टानके कारण तथा गायनी
~ 9 (= ए
छन्द टोनेके कारण गायनी नाम ॥«७॥
वणाश्रमिणां तन्मन्नभदमाह। +
(४ ) ओङ्ारव्याह्तिपूव। गायत्रीं बाह्यणो जपेत! £
्रिष्टुभञ्चैव राजन्यो जगती वेदय एव च ॥ १॥
भाषा) €!
ओकार ओर तीनों व्याहृति साहित गायत्री मरको {८
ब्राह्मण जपे। बिष्टप्छन्दबाछा मत्र क्षत्रिय आर जगती ॥
छन्द्वाछा मच वेश्य जपे ॥ १॥ + ~
2 1
( १) भरद्राजः। | ॥
(२) एतरेयत्रा० ।
(२ ) तारानाथगाण्व्या^ | प्र १६ पं०। ५
( ¢ ) अपराके शाखान्तरे मन्त्रनिखूपणखण्डे | ९६
वा
म.
4
{1 - र ¶
क ट
४ (९८) गायन्नामन्तराथमास्करः। ॥
। | पमि वक 1 ध क त क म कुम 40 कत क-म 4 क 9 9 90 ९0 -# 9199-9 [81
1, स्कतम् । र
ष ४ र | र + ¢ क शः
+ यद्वा सवभप गायना तनाया बह्मस्ञेताम् ।
|
(9
विड् वेष्णवीं सृपो रोद्री सर्वे वा बह्यसंक्ञिताम्॥ २॥
भाषा)
` ६०9 ; (` € > 4९
~ --7
क 04 $
०4 >~
‡ अथवा तीनां वर्णं गायत्रीडन्दवाढा भत्र जपै । तिनं `
¢ अ ~. © + न्द ९ ^~ ~ {3
४ आ।द्वण बह्मण वब्रह्मगायत्रा जपं । केरय ष्णुगायक्ना, &
& क्तरिय रुद्रगायी अथवा तीनो इणे ब्रह्मगायत्री जपं ॥ २॥ &
ध [श थ् ९ ८] लः
ब्रह्मचारिग्रदस्थयोः ध
५ पस्छृतम् । ५
€. म ^ (~ ~ = 4.1
( १ )आङ्ारपूविकास्तसरो महाव्याह्यतयोऽव्ययाः) ‰
= ध
^ नरिपदा चेव साविन्ना विज्ञेयं बरह्मणो मुखम् ॥ १ ॥ `“
¦ (२ ) जपेसप्रणवपूवाभिग्याहताभेः सदेव तु। |
1 ८ र
तिसुभिभूःपर खति्मिगौयनरं ब्रह्मरूपिणीम् ॥ २॥ 1
छ, त
भाषा। र
$ ओकार पवक पीनां अव्यय उथाहृतिपां सहित ्रिपदा
59 4) < => =) ¢: ॥
> गायत्री ब्रह्मघुख जानने योग्य ह ॥ १ ॥ 1
{ प्रणव पूवक तीनों व्याहतियीं (भूः भुवः खः) साहेत 44
५ ब्रह्मरूपिणी गायत्नाके सदव जप ॥२॥ | | <
श (१) मनु०। ० इलो० ८१। †
41 >
नवैर
( २ )खष्वाद्वकायन० । पर० १ इंखो० ४५-४६ |
4
„2-47-4 < 7) नि ॐ. 4 9 - 6 -44:ॐ> प्र क (> /
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ॐ ॐ ^ ५2 ~~ ~ हि
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४) बह्यचारिगहस्थयेभ्रमदः ( १९) 4
इ, अ न (4 0 4 > न 2 > + ~ ~ ~ ८.२
। ५
७ सस्कृतम् । | ओः
^ ( १ )ओङ्ारमादितः ता व्याह वीस्तदनन्तरम् ।
॥ ततोऽधीयेत सावित्रीमेकाय्रः श्रद्धयान्वितः ॥ ३॥
(२) ओमिप्येकाक्षरं ब्रह्येव्येतदात्मायसुच्यते ।
¶ गायञयास्तत्पटित्वादो जपकभं समाचरेत् ॥४।
८ (३ ) प्रणवव्याहतियुतां गायत्री वे जपेत्ततः ।
¢ प ( 8 ) तत्रैकप्रणवा काय गहस्थेजेपकमणि ॥ “
भाषा ।
श्रद्धायुक्त एकाग्र चित्तसे आदिमं ओकार,तदनन्तर महा-
व्याहति, ततपरचात् गायत्रीं ( सावित्री ) मन्रका जप
करे ।॥ ३॥
५4, न [+ आः = न्द €
ॐ एकाक्षर बह्म है ओर दरसाको आतपा कहते रं इसी-
को गाय्नीके आदिमे कहकर जपै ॥ ४ ॥
~ 8.
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सवव
(, इसके अनन्तर मणव व्याहति युक्त गायीको जे, & ।6
८ जपकर्म एक प्रणव युक्त गायत्री गृहस्थो जप करना & `
\, उचितदहै॥९^॥ 4
ति (१ ) द्रम पु० उ० मा० अ० १४ इलो० ५२। ध्
४ (२) रोनकः। स
ष (२) ्यासः। <
५ ( ४ ) वरिष्ठः । &
&-:
(ध ध9 0६
९ नु १6104014 - ‰
~ (२०) गायच्रामन्त्राथभस्करः । ५
। स ण स
ध
५ संस्कृतम् । ध
( १ ) गरहस्थवन् जत्या सदेव ब्रह्मचारिभिः॥ ६॥ 4
पद
~ ( २ ) ग्रहस्थो ब्रह्मचारो च प्रणवायामेमां जपेत् । |
४! अन्ते यः प्रणवडकुयान्नासो वद्धिमवाप्तुयात् ॥ ५॥
¢ (३ ) ओङ्कारो व्याहतास्तसः परथमं संब्रयाजयेत्। ¦,
८ ओङ्कारायाचिराव॒त्य वेदस्यारस्भणे तथा ॥ < ॥
4 प्रणवाद्या तु विज्ञेया जपे उ्याह्यतिभः सह ।
नि ¬~ ^द5 4
2 ॥ 74 ॥ ¢ +.
7
ने भनु क्च 8 न) 29
[| प्रणवनब्धाह्ातामः साद स्वाहान्त हमक्माण।?॥ ॑
५ भाषा। रु
१ ब्रह्यचारयांको भां गृदस्थाक। भा।ते गायत्र[सदव जपना 4
युः चाहय ॥ &॥ ्
गृहस्थ ओर ब्रह्मचारी प्रणवको आदिमे कहके गाय्री 4
4४ जपै जो अन्तम प्रणवकी योजना करके नपते हँ वे बाद 4
८ के नद पाप्त हति हं ॥ ७ ॥ भ 4
्् आकार आर् ताना व्याद्तयाकेा प्रथमं यजना 11
^ करै । तथा वेदकरे आरम्भे ओकरारयुक्त गायत्री तीन वार 1
< जपे ॥ ८ ॥ ४)
जपम प्रणवादि व्याहतियों सहित गायनी जानना चादि \!
५; य । होमकरमम स्वाहा के अन्तक प्रणब ओर व्याति सहि 4
^ त जपना चाहिये ॥ ९ ॥ ध
न १ समृतिचन्दिकायाम् । 4
(२) यो० याज्ञ० अण ४।२६। र
& (३) यो० या्न० ज० ४।३८,३९,४०.। ५
{९५ ~<
शद 3 <= ~“
2२९
पुन ०0600064
त
वानप्रस्थादाना म्रजमद्ः । (२१) क
क भम + 9१9 + कनक + ^ + नकन के न+ नरक क ककन ककर रेकु भ 9११99 रकम ॐ
3
वान्प्रस्थादीनाम् ।
सस्कृतम् । €
( १) ओङ्कारं पूवेमुचायं भरशुवः स्वस्तथव च । ४
७;
न
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> (2 ^ ऋ ~ महते @> कु = ~+ 4 १7 4 9 ०
१ 14 [96 0, (2, 4
(1) ~, पि # छः
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1
+
,, गायत्री प्रणवश्चान्ते जपो दयेवमुदाहतः ॥ १ ॥ @
स भाषा । (6
पारिठे ओंङ्गारका उच्चारण करके पिर शशव; खः अ
०
8.
(\ नन्तर त्रिपदा गायत्री ओर अन्तम आकर सित गाय- 4
. च्रीका ज कहा गया है॥ १॥ 4
| | २१
(१.५4 क तू
+ गायत्रीप्रणवयोगकरणे हेतः *
८ सुस्करृतम् । | ५
८ (२) गायन्री पकरतिर्ञेया ओङ्कारः पुरुषः स्षतः। |
५ ताभ्यामनभयसयोगालगच्छव प्रवत्तते ॥१॥ 4
|) 1
५ भाषा । ४
५) @ ० ~ ®> 9 स र 8)
गायको म्रकृति जानन! चारय, ओंकार परुष कहा 4
|, गया है, इन दोरनाके सयोगं सच जगत् होता हे ॥ १॥ 4
॥ -- क ~-
4 ( १) व्र° यो० यांज्ञु°। £
१ @
( २ ) ब्रहययोगियाज्ञव ० अ० ४।१७.।
2 55. 9 ह 9 < नि नि > (क्वनि क ग 7
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नि मि म म भ ग म म
( अ , गायत्रीमन्त्रः ।
1 (अत. -
( १९ )ॐ* भरभुवः खः ततसवितुवेरेण्यं भगा देवस्य
के
। धिया या नः प्रचादयात् ॥ १॥.
~~~
पटच्छट्ः।
आप्र भ्ः । भुवः। स्वः। तत्। सावेतः। वरेण्यम्।
मगेः । दृवस्य । धामदह । धियः) यः! नः।
पचोदयात् ॥ १॥
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४ "ॐ
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अन्वयः । श्
सवितः देवस्य यद्वरेण्यं भगः नः पियः प्रचो- ,.
कः = [9 (श 1 ॥:
. दयात् ( ब्ररयति ) तत् धीमहि । कीदशं तत्रभूः +,
गृ
भुवः स्वः । पुनः काटरम्, ओम् ॥ १॥
ग्निना
। शौ ~ # न
1, अनि
11 1
११४) ~ 94...
न् न्;
दुः
५१
अथवा-सवितुः दवस्य यद्ररेण्यं भगः धीमाहि,
~
तत् नः धियः चच।दयात् ( प्ररयेत् ) कटरा तत्, &
भूभृतः स्वः | पुनः कौटशम्र, ओम् ॥ २ £
( अ ) मंत्रो मननात् निरु० दै° ७ अ० ३ पा०& ख० ) य
१४ ~ । च ४ []
=> क + 6 कदे रगु ८
४६ . < प : ¢ ४ =
नै = र च्यः
५. मन॒नात्त्वरूपस्य मितदेवस्य (१ ु
१) त्रायते सनभरतस्तस्मान्म॑त् दतीरतः | (कराणवतन्त्रे १७।१
{ जायपन्ध्दायप्रदशकरगायत्रीभाष्य प्र २४) (=
(५ ( १) त° व° अष्ट० ३अ० ०व०१०म््० २अ० ५ घ ६२ 4
(4 मन्त्र १०, शकयजुेद अ० ३। म० २५ ।
् छृपष्णयजुर्ेद कां०१ अ० | प्र° २। अनु ° ६। ध
ध सामवेद उत्त०५ ०१३ ख०४अ०६अ०२सू०९ऋ०१। ्
0
(२ ) गायक्नामन््ाथभास्करः । <
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प्रणवमहत्छम् । (२३) &
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यद्वा-यः ( सविता)नः धियःप्रचोदयात्(्ेरयति)
र
; तत्, तस्य सवितुः देवस्य वरेण्यं भर्म धीमहि, ५
तर्कोटशम्-भथवः स्वः, पुनः कट रम्,आओम्॥ ३)
2 इः
इति(याज्ञवस्क्यभारद्राजागस्त्यक़तभाष्यानुसारेण €
{ ५
¦^ पदये(लना कृता ) ।
(= =
<) ५,
५ प्रणवमहत्त्वम् ) <
{4 सस्कृतम् । श
४ ५
(१) ओङ्ारस्तु परं ब्य गायत्र स्यात्तदक्षरम्)
दः > १ न्व उ स
/; एव मन्त्र सहायागः साक्षारतार उकाहतः ॥ १॥ ¦
, (२) अकरं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः ,
९.१ ५४
‡ वेदत्रयाश्चैरदुहद् भूभुवः स्वररेताति च॥२॥
(व
् भाषा ५
‰ आकार परजरह हे अर् गायत्रो उसका अक्षर ह इसमकार &
^ यद् सन्त्र महायोग आर सक्षात् सार कहा गया ६॥ १९ ॥ 4
\ अकार् उकार मङ्ार आरभ सःकोः ब्रह्मान तानां {|
\ वेदति सारह्प प्रकट किया ६॥२॥ ।
। सष ६
(१) ओंशनसस्मृते ३।५२। ५
(२) मनु°। ज० २।७६। 1
स द
8
ध (२४) गायत्रीमन््ाधभास्करः। 4
५ न
९ संस्कृतम् । ध
( १) सारभूतादच वेदानां गुह्योपनिषदः स्मृताः ¢
4 जै
1 भ्यस्सार त॒ गायत्री गायन्या उ्याहतित्रयम्॥३॥
2, ४
+ उयह्ातभ्यस्तथाङ्कराखव्रृदबह्य सं उच्यत् । 1
निव्रद्ब्रह्याण नघ्णातः पर ब्ह्यषगच्छत ॥४॥
ल
8
१
8 भि न्
% आङ्ारः परम बह्य सवसमन्त्रेषु नायकः । ध
छि ॐ न (=
१ "दि
ॐ प्रजापतक्षखोतयन्नः तपगकसेदस्य वे पररा॥ ५॥ `!
द छ द 4
५४ भाषा । |
| ~< नि न. __ >. नज. ^ | ४2
८ बद्र सार गद्य उप(नषद् कहं गये ह ।तेनका सार ४
दः गायत्री, गायञ्नीका सार तीनों व्याति हं ॥ ३॥ 4
| [क
| । 2 तीनो व्याहृतियोका सार आकार कहा गया हे ओंकारको ¦|
| 1 त्रिमात्र ब्रह्म कहते टं, मभा बरहम जो मग्र रदता हैबह ॥
॥ परब्रह्मक्ो प्राप्न हाता है ॥ ८४॥ ५
९ >. न, ञं 999 न् अ [चका र व्
ओंकार पर्रह्महै ओर सव मन्म श्रेष्ठ ह आदिमे धु
(2 ० । ३ . कः
८ तपते सिद्ध ईए वह्यके सुखसे प्रकट हआ है ॥ ५॥ ५
४ ध
| |
@ (१) बर° यो० याज्ञ० अ०४।७८-७९ । अ० २।२-२।
कश
(9 ‰- + &भ 47 ह > षः -& £ 1 ‰] (€ ्
1) प्रणयस्य बह्मषोधकतम् । (२५) 4
4 १ क #
(नि श ॐ चै चक + - (> # नकश! (र गी क >; + -म9^ र नेति भी क 4) क -क-११ ~ क शन्कर म क ११ ~क} कौ ११ क ११ की केन
$ प्रणवस्य ब्रह्मबोधकतमय् । ध
_ संस्छृतम् । र
र
£=~*~& (~,
( ए ध
, (१) ओभितिक्ह्य॥१॥
नि
~,
५
० र
८ स ओमित्येतदक्षरमपदयद्िवणं चतमौत्रम् ।
$ सवव्यापि सवेविभ्वयातयास व्रह्म ॥ २॥
(२) हंसश्रणवयोरभेद इति ॥३॥
^;
न ~ ~ 4
८) ० > क. ८.
(३८ प्रणवहंसः परबद्येति ॥ ४॥ ५
(४) परच्ापरच ब्रह्य यदाङ्कारः॥4॥
५ ओङ्ार एवेद१९५ स ५
. . (५4) ओङ्कार एवेद१५ सवम् ॥ ६५ ५
तव भाषा ।
"2 --
प
ओकर व्रह्यदहं॥१॥
बह्मनि ओम् इष अप्षरको दला ज दो वणं ओं चार ,
, मात्रावाखा सवेव्यापी नाशरहित बद्यहै॥२॥
दंस ( परमातसा ) ओर प्रण (ॐ )मे भेद नहीं ह।३॥
“+ प्रणव ओर् हस ये दोनों परब्रह्म ॥५॥
4 ओकार निगुण ओर सण बह्म हे ॥ ५॥
(† (१) तेत्तिरीो१०।अ ० १।८-गोपथव्राह्मण पूवेमाग्प० एव्रा०१६
+ #
~> ~
१ (२) पापतत्रह्मोप०
¢ (३) परव्रह्मोप०
र (४) प्ररन० ५।२
$ (५) छन्वो० २।२३।३ ।
6५6 धनिने
(स, "+ ७ <; ५9 2 ७ # © *‡ ८९४. ४० - ५९ 44 © == ~ 2 (= 4 ६.१ द
®< >~ ~ ~: ~ 9 ---- णद <
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109 ९६० 706 - ४466
त ४ शुः + ७. -.+ ५ ~> * - $ ~ 4 { ह, - =+ {~ 4
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(€ ); गायन्नामन्घाधभास्रः।
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4 णि 7 क ष; => +त र शै ; क "कदर र गिं # ०" + , ~<= 8. 1 > ह अ - (र; #४ ३ शै कै क्र नि
%
4 संस्कृतम् ।
(२ )भृतम्भवद्धविष्यति सवमोङ्कार एव यचा-
6
-+
©
> ग्र
(~ +
¦ न्यलिकाटातीते तदप्योङ्कार एव सोऽयमारमाऽ | |
( ध्यक्षरमोंकारोऽधिमाच्रम्। ओमित्येतदक्षरमिद?9
४ |
८ सर्वंम्र ॥ ७॥ | ४
८ (८२) यदमूर्तं तत्सत्थ तद्रह्य यद्रह्य तजञ्ञ्यो-
५4 ति्थज्ञ्योतिः स अदित्यः वा एव आओमित्येत. ५
‰ दात्माऽप्यभवत् ॥ < ॥
4 (३) ओं तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणचित्िधः '।
¦ स्मृतः॥९॥ |
भाषा । £
~+ ~, *^
) "<
1
मशि
भूत, वत्त॑मान ओर भाष्रष्य सथर ओंकारल्पदै । तथा
जो ऊछ तनां काल्प परह निश्चपर ककेस। भी ओकार
ध रूप हं बह आकर यह आत्मा ह-१२ अध्प्रक्षटः नाराराहत 8
) तथा अधिमत्रा यह सपे खषटि ओंक्ारर्प हे ॥ ७ ॥
=:
2 )
(† जे रूपररित है, वह स्यद वही बह्याहे जा बह्महै “¦
4 वह प्रकारखसरूप ह, जो प्रकठाशव्वरूप दै वद सृषं है, वदी `
4 सूय्थं अकार दै वही अत्माहे॥८॥ ध
¡ _ अततत यह वहा तीन महरा नाम कहा गमा है९॥
‰ (१) माण्डूक्य | श्रु° १६८१ रु
1 ( २) मेत्रयुपनिष्रदि० ६।३। +
श्र (३ ) मगवद्वीतायाम् | अ० १७।२३। ध
{4 01069600 धन 899; ¢ र
4 &-- 2 >~ >>: >~ & <~ @~न -= ॐ +~ £ >= ~> २
४६ =^, (४ 9 क 8) ह = छि => - ध ह ठ | ५२१
ग्रणवस्य ब्रह्मबेधकत्वम् । (२७) इ
१ ------------------ 9
। संस्कृतम् । ।
(१) तस्य (ईश्वरस्य ) वाचकः प्रणवः ॥१०। 4
(२) चिमाच्रादधपर बह्म मात्राक्षरविवाजतम्॥ &
अचिन्त्यमग्ययं सूक्ष्मं निष्कलं परमं पदम् ॥ ११॥
~ वाच्यः स ईश्वरः घरोक्तो वाचकः प्रणवः स्प्रतः॥ 4
‡ वाचकेऽपि च विज्ञाते वाच्य एव प्रसीदति ॥१२॥
४ भाषा।
+ तिस इश्वरका बाचकं ( बोधक) प्रणव दहे ॥ १०॥ |
तीनमा्रसेपरे जो अमत्र है गह परब्रह्यहूप रै, जा 4
‰ पाञ्चा ओर अक्षरे रहित, अचिन्त्य, अव्यथ, सृक्ष्मनिष्फर
षु ( कृटाराहत ) अर परमप्रद ई।॥९९॥ ध |
ध्रु वाच्य इश्वरहै आर वाचक प्रणवं कहा गा दषवाचक(प्रणव,) €
4 का विेषज्ञान हानेपर वाच्य ( इश्वर ) ्रसन्न होता है ॥१२॥ ष
५1 प्रणवफटम् । (त
4 संस्कृतम् ।
¦ (-३)ओभिवेकाश्रं बह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। (।
¦ ` यः प्रयाति त्यजन्देहं सं याति परमां गतिम् ॥ १॥ ¦
४ भाषा।
¢ _ ॐ इस एकाक्षर ब्रह्मका जप ओर मेग स्मरण करतः हआ
श ( १) पातजल्योगसरत्राणि । १ पा० २७ सू०। ४
प (२) ब्र° यो० याज्ञ° अ०२। ४४। 6
द ( ३ ) गीतायाम् ८१३ । ४।
म ~~ , ~ ध) ¢ - क) < ~ -~ & नि ~^ १, ति र 1 नि. निः ) हः ६! 447
८.४
४
(0444
९१
द भ [ 1 #ै ध
४ (< गायज्ञामन्ाथभास्करः 1
- ह (^ 2
[-. 9 न न मी मिप म छ कं <
9 ष
(५ ॐ
4 14।
"="
४ संस्कृतम् ।
५ ( १) यदोङ्ारमक्ृता किचिदारभ्यते तद्ध
¦ च्रीभवति । तस्माद्रजभयाद्धीतमोकार प्रवमारभे-
कत "र
पः न
"लव
£ भाषा । 4
ओआकारका उच्चारण न करफेजो चछ (श्रौतादि ) ध्र
# कार्य आरम्भ किया जाता है वह वच्रधत् हाजाता ३ अति
गकर
=>
निष्फङ दजावा हे । तिसक्रारण व्क भयस उर उ्कारभ
उचारण प्रवेकं कायकां अ।रम्भ करे ॥२॥
प्रणवनामानि ।
संस्कृतम् । |
(२) आकारं पणवञेव सवघ्यापिनमेवे {¦
4 च । अनन्तं च तथा तारं हक्छं वैशयुतमेव च ॥ 4
;> $
# 1
8
# [1
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५.
कि >
८ क, .
<; 3 प ।
= ॐ गॐ
1 ~~ | 4. 4 [न न 1 क ~~ १४
भा 4 1 ¢ ‰] {शि ‰
9. > ~ द: त ~~ ~ 4
च च
£ देस वु परत्ह्म इति नमानि जानत ॥ १॥ |
[81 भाषा । प
४ ओंकार, प्रणप) स्ैव्यापी) अनन्त, तार, शुष्क, वैचयत \
‡ दस, तथे, परव्रह्म इन आङ्गार नामोको जानी ॥ १॥
; { -____~__~_~_~_~_______~__~_्]ब ]-~~--~--]बब-ब-~-~--~--~~~~~~-~--~------~ ^“
^ ( १) छन्दोग्यपरि०। त्
४. ( २ भ्रु यो०-याज्ञ॒०° अ० | २।११६-११७। ५
(44744414 44440424
© ---9 5)
र = 5-23-2 5५५ ¢ 2-1 => ५४ सी
५ ग ४44 ~> -<& ४ 2. ४2 1, ध 9 0 १. द श ४४ 9 =
४.
3
८
४ पदाथाः-ओरम् | (२०४) |
५ क ०9 ~ ९
न
3 + |
पदार्थाः-ओेम् । ५
¢.) | +
{ज ६
सस्कृतम् । 1
५ त6ो एष गन १
$ (१) आप्टुधातुरतिमप्येके रूपसामान्यादथ ५
{> = = त पाती +
सामान्यान्नेदायस्तस्मादपिराद्धारः सवमा १
[| ~" क
(+ व्यथः ॥ १ ॥ ॥
त [ स । [प ५
(२) अव-रक्चाप्रकारपाखनाहसावृद्धयाद् 4
ध \ अवति चतुदैश्षभुवनानीत्योम् ॥ २॥ ध
& ५
{न् भाषा । |
५ = र = + =® [|
ध आष्ट्र व्याप्तां अव रक्षणे इन द्न। धातुओंक्रा रूप सामान्य 4
(= ह ३७५ क + = 90.
& कथन किया दै इससे अथ॑ सपान्य है तिषसे आष्ट धातुसे ५
|= ९/ ¢ न, --
4 अकार सवेव्यापीदहे ॥ ९॥ ५
(ष [क [** = नट
५ अव-ध।ठ्, रक्षा-मकाश-पालन रिसा बृद्धि आदि अथेमे (|
(है । चतुदश शवनके रक्षा करनेके कारण उकार नाम ५ |
५ हुआ ॥२॥ ४
४ ५
१ ( ९) गोपथव्रा० पूण भा° प्र०२त्रा०२६। 1
ध्म (२) विष्णुस० भा० [ शाब्दकल्पदुमकोशे च ] \¶
0
%
(009४
4
ॐ (३०) गायत्रीमन्वराधभास्करः । ५
= क ध.
2 ४
¢ ८; ।
८ संस्कृतम् ।
< 8
(१) अवति संसारसागरादिति ओम् । ५
५ अवतेष्टिरोपश्चत्योणादिकसुत्रेण मनूघ्रत्यथः । ध
(| प्रत्ययस्य रिखोपः । उ्वरत्वरेव्यदिनोढ, ततो व
(4 गुणः ततः दषछाचारणामात नक्यया जारम् । ॥
¦ इति निष्यन्नभ् ॥ ३ ॥ |
५ = = "९ = त
` > (२) ब-ण्-स्ततो-प्रकषण नूयते स्त्रयते आत्मा |
१५ ५ शे
८ स्वेष्टदेवता अनेनेति प्रणवः ॥ ४ ॥ त
४ भाषा । ४)
संस्ारमागप्ते रक्षा करता है इतत अ नाम हआ) अपे (|
(~ धतुसे “अवनेष्टिलोपश्च"-दृस उणादि सत्रप मन॒ प्रत्यय |
न [ने
94
॥ नू
हान पर ओर मन््रतययङ लपि करन पर् ( प्रत्पर० )
(1 इतय्/दि सूरत उश करसे तदनन्तर गुण करने पर मिटा ||
= करके उच्चरण करनेते ॐ नाम सिद्ध हुआ ॥३॥ ।
‡ प्र-उपस)। प्रक णुः धातु स्तुति अथव । अच्छी-
(^ च्छीः
= तरदसे स्तुति कीजाय आतमा खेष्ट॒देवताकी जिपत-
4 करके वह प्रणव है ॥ ८ ॥ र
# --- ~~
ब्र 8 {ल
# (१) ब्हत्सं° भा०। ४
(५) ( २) विष्णुस्त० भा०। £
(4 ~ ^ ~ ~ -~ 249) + ध
6.
~ ५ : * * ह ~ क + ५५
१८2, = 23 +: ° ~ 32. ~ क. ~ २-, (5२1 > क; ~ ९२ त) --
११.११. 1 ५ । ; ॥. 1 (> | 1 | 7. ४ 5) {1 1 1 + |!
द "+ = - ध ~ 0-9-99 = - र =-= -=- (अ ~ प -,- < क +~ र्
{ 3 ॥ च 1 ~
(=
(४ पदाथाः ओम् । ( ३१
(.7) म
4-#
५ 1 (क +न+ 1 न" ++ र > > म 9 + + ("द मकै ह ने रम- षि ~त नि > > र > (र मि रि मि >
¢<
04
(1
संस्कृतम् । ८
$ ( १) अकारङ्चाप्युकाररच मकारश्चाक्षरत्रयम्॥ &
रि
+ 4 गा
~ क
|> › 1
+ £ ॥
2 ॥, (0 | 5
‡ बह्या विष्णुश्च रुद्रश्च त्रिरवत्य उदाहतः॥ ~ ॥
(२ ) प्रणवा हे परन्तततव तवेद् च्िगुणा-
` रमकप् ॥ च्रिवेदस्वं त्रिधामं च तरिधज्ञं धरिरवस्थि- ¦|
¦ तम् ॥ £ ॥
८. चजिमानं च तिकारं च त्रिलिङ्गं कवयो विदुः
¶
~ (ऋ =
् सवंमेतच्चिरूपेण व्यासं तु पणवेन तु ॥ ७ ॥ ध
4 अकार, उकार, मकार यह तीना अक्षर बह्मा, वेष्णु रद्र; ५
५ अिदवता कहं गय ह ॥ ^ ॥ भ्व
1 निश्चय करकं प्रणव परमतक्छ तान् वड् अरतान शण &
रूप हे । तथा तीन धाम तीन प्रज्ञा तीन अवस्था रूष दे॥६॥ 4
+$ तीन प्रमाण तीन कार ओर तीन रूप कवि रोग जानते ५
५५ है । यह सवै सृष्टि विराट् द्िरण्यगभ ररूप मणक्ते
4 परिश्णं है ॥ ७॥ ्
प ( १) त्र° यो० याज्ञवल्क्य०° | अ० २।१९-२०। | ४)
भि (२) व° पाराशरसं० ( षट्कमांणि स्वरूपवणेनम् ›) अ० ५। 9
# छो° १०-११। ४
#
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{ब
> , 9 ~ 4 0 24
{98 #! ध 11.44. 1. ५५५४... ५ 1: (वि १.४.) ^ धिः 9 वि 84
व 48
(९ गायन्नीमन्ताधमास्करः । ५
ए पम ५
माजाभेदाः ८
(१)अ१उ २ म अद्धमात्रा ४ (
कृष्णा कपिटा अद्धस्फटिकसान्नेभा 4
यजुः साम अथणः 4
शि ९: सुवः स्वः मर्य] कः
ॐ गायज्यम् ननेष्टुनम् जागतम् अवुष्टुभम् ५
५ भरमिखकः अतरिक्षलोकः सुरलाकः परकः &
अश्रिः वायुः आदित्यः सर्वदेवत्या 9।
4 रजः सत्त्वम् तमः निगणः ८
८ बह्मा विष्णुः शिवः निराकारः ५
८. विराट् हिरण्यगभेः ईश्वरः बह्म ५
(| विः तेत्सः प्रज्ञः कूटस्थः ।
८ नाहि"पज्ञः अन्तःपज्ञः धनभज्ञः च्रिभज्ञरहितः
! स्थूरशरीरम् सृक्ष्मशर्रिम् कारणङारीरम् भरारीरम् ध
१ जाग्रत् स्थप्रः सुपुप्िः तीया
(4 मनद १४ अन्तःकरणं चित्तम् करणरदितम् च
‰& वाचमध्यार पराणमध्या० मनञध्या० जयोतिरष्यालमम् 4
५ स्थूटधृक् = सूर्मजुक् = आनन्दयुक् भागरदितः ९
4 ब्रह्मचयः गरहस्थः वपनप्रस्थः सन्यासः ५
च धपः अथः कामः मोक्षः (=
८ ब्रह्मलोक- विष्णलाक- रिवलोक- अन।मयपद्- (
(भातिः षिः प्रक्षि पिष ल
( १ ) गोपथत्रा त्रहमविधोप०अथर्वशिखोप०वृ ण्यो ०याज्ञ०वृ ० 4
पाराशर० गायत्रीनिवाणशिवरदस्ये ।
4
(3 ८8
04444644 424
6
(09
न माजाभदेष्वरन्यादीनां व्याख्याः (३३) &
` रि नि
६ मात्राभदष्वगन्यादीर्ना व्याख्याः । 4
५ व संस्कृतम् ।
^ अश्निः=अज्चु गतिपूजनयोः-गतेखरयोऽथाः ज्ञानं 4
+ गमनं प्रातिश्वेति-पूजने सत्कारः । अजति ५
5 अच्येते वा सोयमेः ॥ १॥ १
वायुः=वा गतिगन्धनयोः-गन्धनं हिंसनम्,
वाति सोऽय वायुः चराचर जगद्धारयाते वा स
+ वायुः ॥ २॥ ५
आदित्यः = दोऽवखण्डने-अवखण्डनं विनाशः!
८! व्यति नदयतीति व्युत्पत्या दित्यः न दिव्यः अदि-
(‹ व्यः अदित्यः एवादित्यः ॥ ३ ॥
८ भाषा ।
५ ( अभिः ) “अञ्चु धातु गति पूजन अभम, ओर
|
[1
ऋं,
(4
"कीं
~~
हि
#॥ क
ववद
गतिके ज्ञान, गमन, मराति ये तीन अर्थं है,पूजन सत्कार है ।
! सवन्न जा उयाप्त हं अथवा सबसे पूजित हे वह अभि ३।१॥
' (वायुः) "वा" धातु गति गन्धन अभैमं है, गन्धन कहते
दं हिंसनको, चले जा अथवा चराचर जगतको प्राणरूपसे
चारण कर् वह् वायु ह । वायु परमश्वर ह ॥
( आदित्यः ) दो' धाह 'अबखण्डनः अथे है । अव
ण्डन विनाशक कहते है । जो नाश हो वह दिस्य है ओर
सका नाश न ही बह अदित्य हे ओर वही आदित्य ३।॥३॥
110 08880 ८
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~ ५५.
( ३.४ ) गायन्नीमन्बाथभास्करः ।
संस्कतम् ।
बरह्मा=वह बहि वद्धो, वहयति वद्धयति जगत्
१
०८
जः ष
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४. । ५9: ^ ++ +.
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4 इति बरह्मा ॥ ४ ॥ ।
‰ _ विष्ण=विष्ट व्यातो, वेवेष्टि व्याप्नोति चरा-
ष चरं जगत् स विष्णः ॥ ५ ॥ ८
^ ,. शिषः=शीड् शयने-शेते चराचरं जगदस्मिन् ध
{ स एवः ॥६॥ 4
1
बु
~=
निराकारः=नास्व्याकारो यस्य स निराकारः॥७॥
विराट्=“राज दाप्तो-विविधं चराचरं जगत
राजते परकाशते स विराट ॥ < ॥
भषा | [५।
ॐ (अरह्या ) बह बाहः का अथव्रादे दः जो संसारक ५
वटि उसे बह्मा कते ह । ओर स्वथ बृहत् ओर परिपूर्णं !,
हो उसे भी ब्रह्मा कहते दं ॥४॥
( विष्णुः ) "विपट्टर' धाठुका अथं व्याप्ते जो चराचर 4
जगत् व्याप्त हो वह विष्णु है ॥ ९ ॥ श
( शिवः >) (शी' धाठुका दयन अर्थं होत। है, चराचर ५
जगत् जिसम सावे उस रिव कहते है ॥ £ ॥ ४1
( निराकारःजिसका चवरूप नहीं है वह निराकार ६७; 4
८ विराट् ) राज धतु प्रकाश अर्थं है जो नानाप्रकारके म
चराचर जगतुका प्रकाशेत करे वह विराट् है॥ < ॥
द
0 6 ० धः
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भि मच्रामदेष्वन्पादीनां व्याख्याः । ८ ३८ )
1) 0 भवनि वि क ^ ग ला दण क र थय ९
8 संस्कृतम् । &
2) ष!
> हिरण्यगभः = हिरण्यं तजसो नाम, हिरण्यानि ख
£ सूयादीनि तजांसि गभे यस्य स हिरण्यगभः-वा
ट हिरण्यानां सयदना तजसा गभः हरण्यगमेः श्
् ( उ्योतेवे हेरण्यम-शतपथन्रा०) = हिरण्यगभः [3
‡ समवतता भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्
# ( यज्ञवेद् ) ॥९॥ ््
्् ७ < न ० © - = (न | ष, ञ्
= (इश्वरः = श श्ये, देश्यं करोति असो
ध £ ^ (~ ~ । ५ ॥
ॐ इरः स्वे श्चयवानिति ॥ १० ॥ [त
< भाषा | क
इ ९ब्
‡ ( दद्रण्यगभ्ः ) दिरण्य तेजका नीम प्रकाशरूप ध
५ सू 1 तञ जसम व्याप्त हे वह् दहिरण्यगभदहे। अथवा ५4
= मूधाद्क तजा उतपत्तिस्थान हिरण्यगर्भे है । ज्येत्ति ही
निश्चय करके दिरण्य दै फेसा शतपथ जह्यणका वचन है 1 &
$ दहरण्यगम प्रथम इआ जससे भूर्तोकी उत्पत्ति इरे । वही &
$ एक पात था) यह यजुवदका वचन दै ॥ ९॥ र
¦ ( इश्वरः )६श' धातु शव्यं अथे है । ज अने रेशवर्यतं अ
सवका पाटन करे वह् इश्वर दै, अथवा जो सपे रेश्वभेवाटा ध
श्र हे॥ १०॥
(९ ;
। ट # श्रः ~ ॐ $> ॐ शृ दः - . निर
५ 1 9, ॥ (॥१। च #॥ । + ? 1
क
( ३६ ) गायन्नीमन्बाथभास्करः ्
न ,
1
ञे ष्मः (9
+ बिश्व=विश्च धवेशने-विदान्ति स्वाणि भतानि ` |
{ 1
+, क) की -को- 41 की नि ~क "+ (न ण ने +र“ कर + यः
५ व
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ॐ: ्
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१
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४ [क्प
£ आकाडादाने यास्सन् स विश्चः( वा) विरात
|) ~
ज
| ¦ ५
¶ ग्यष्टिस्थृलारीरं भ्ाभोतीति विद्वः ॥ १९॥ ८
"स्थः १०८
५ ^~ ~ [+ ष ^ |
४ तेजसः = तिज निशानि, निशान सुक्ष्मीकरणम्, “
च ५ स | 4
& तजान्ते सृक्ष्मवासनामयप्रज्ञायामाश्चयत्वेन वते- (.
; 1
~ मान इति तेजसः; वा सूयादीनां परकाशखा- ८
नयः ^ [क
%& देति ॥ १२॥ |
त्त् ` ५
८ भाषा । ध
= (विश्वः) ' विक" यवेशन अर्थे हैः मेरा दो सम्पूण
4 धेत आकाशादि जिसमे वह विश्व हे, व्यष्टि स्थूल शारीरम 4
ॐ जा परिपूण हं वह शव द ॥ ११॥ <
^ ( तेजसः) (तिजः निश्चान अथमें ह । निदान सृक्ष्म कर- ध
< नेको कहते ह । सुक्ष्म वासनामय बुद्धिम आश्रय करके जो &
‰ साक्षा खूपते षरमान ३ वह तैजस है, अथवा र््यादिकोंका &
ध प्रकाद्चक होने तेजस नाम हे॥ १२॥ ५
00202054 94
त 1 % 11 चि >> ५६
४
08041419
माजामेदेष्गन्यादीनां व्याख्याः । (३७
॥ 6
संस्कृतम् ।
प्राक्ञः ॥ १३ ॥
५ कुटस्थः=कृटे मायाकायविकारे आकारावत्ति
(* छतीत्ति कटस्थः । (कूटस्थोऽक्षर उच्यते! 1० अ°
4 ९५९६ ) ॥ १९ ॥
भाषा ।
$ (प्रज्ञः) क्ञा' धातु अवबोधन अथेमे है, अच्छी तरसे
# जो जने उप्तका नाम प्रज्ञ हे, अथवा ` खप्रकाशातममें
अज्ञानरूप वर्तिका जिसको बोध है वह रज्ञ है, अथवा
4 चराचर जगत्कौ जो जानता हे वह मज्ञ है । भ्र्नशी प्राज्न
8] न=
! हे ॥ १२॥
श्ककी तरह जो स्थितहै वह कूटस्थ हे । कूटस्थको अक्षर
क ( नाश रहित ) कहते हँ ( गीता अध्याय १५ ।९६ ?॥१४॥
(२ {-& ~ <= 24 4
व 44
पराज्ञः = ज्ञा अववबोधने-जानएतीति ज्ञः, षकरष्ट- ;
श्वासौ ज्ञश्च प्रज्ञः ( वा ) परक्ृष्ट स्वप्रकाशात्मनि
¢ ज्ञान ज्ञसिरज्ञानघृतत्यास्मको बोधो यस्य सः रज्ञः 0
^ ( वा प्रजानाति चराचरं जगत् स प्रज्ञः,षनज्ञ एव
(कूटस्थः › कूट अथात् मायाके कायके विकारमे आकारा ध
निनि
८५. 1
(. नि ४ £ ि
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(२३८ ) गायत्नरौमन्त्राथभास्करः । ५,
= न भी भी भ मीभीर्थिम ममी भौ मीम भीभीम ः
1
= नि #-> 4 >) =+ ‡ 4
९४.५.५9. छ् ~, 39.
(न~ (0. न्व +
प्रकारान्तरेण मावार्थाः ¦
. संस्कृतम्।
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५ कै र क } ४, न । ५ ; ~ 1 न~
0.
~ > 4 किः, ~ चक:
~ ~ +
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+: त
19
ध : (१) समष्टिञ्यष्टिस्थुलप्रपचेपहितचैतन्य- ..
& मकारार्थःलस्स्थटप्रपचांडपरित्यागन केवलचेत- ५
‡ न्यमात्रमकारेण रक्ष्यते ॥ १ ॥
तथा समष्टिञ्य्िसक्ष्मपपचोपहितं वेतन्य- +
< मुकाराथः । तत्त॒क्ष्मप्रप॑चांशपरित्यागेन केवट- ध
¦ चेतन्यमातरमकारेण लक्ष्यते ॥ २ ॥
& भाषा। |
;3 सप्रषटि व्यष्टि स्थूल प्रप्धोपदित चेतन्य आकारका
वाच्यार्थं है तिस स्थूल प्रपश्वरूप अंश्चके परिव्याग्से जे
[१ + श्रै क १८६ 3 ८९
केवट चेतन्यमा् रहता है वह अकारसे ठश्षित होता हे ॥१॥
4
७ ६ 44
५
<."
भ
४
प ५4 ६ (+) ६ रः
+. ~ ० \
+~ ह.
६४
तथा समष्टि व्यष्टि स्म परपशचोपहित चेतन्य उकारका ^
वाच्यार्थं हे तिसः सृक्ष्प प्रपंच अंशके परित्यागमे जां क्षल
> 0 ष्क.
>~ ` $¢»?
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१.
् „८
४
७
चैतन्य दोष है वह उकारका रक्ष्या है) २॥
८4
३५ ९
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१
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५». रः :
ध 9 ->
& ‡ &
ॐ (१) रिवरहस्यभा०। [६१
। ॥
श. ८.3
५. 1 ४ हः. -‡ॐ- नः शरत ४ ~ 2 रि ++ & $> = 2 द + न न + क का ^= 242; +“ ~> ++ 4 4 {+> ५२.
(46444444 4348 2
क नरी
(4 “99 -८8 "9 455
५ प्रकारान्तरेण माजाथीः। (३९)
५) न म न भ भ मीम भ भभम धः
{८ 1
तथा समष्टिव्यष्टेस्धूलसक्ष्मप्रपचहयका-
रणभ्रतमायोपहितचेतन्यं मकाराथः । त्दशमा- &
यांशपरि्थागेन केवखचेतन्यसात्रं सकारेण
रक्ष्यते । ३ ॥
एवं तरीयत्वसवानगतत्वोपहितं चेतन्यमङमा-
थः. तदपाधेपरेत्यागेनाद्धमाच्रया चेतन्यमाच्र
लक्ष्यते ! एव चतणा समानाषेकरणपादर भेदबोधे
$. पास्यिणमदहितीयं चेतन्यमाचरभमेव सवद्रेतापमदन
4; : < <9 त < @ ९ << भज ८ र 59 कि = ४4 1
जक = -.4-4--- ५4 -
=
14
तद
। वन्वन ८
+$ सिद्ध भवति ॥ ४॥ स
८ भाषा। ४
{ तथा समष्टे व्यष्टि स्थूल सूक्ष्म दोर्नो प्रपञ्चोका कारण &
,\ जो माया उपारत. चेतन्यं दं वह सकारका वच्याथ ह।
(4 इसी प्रकार मायारूप अंशके परित्यागे केवर चैतन्या
,\ मकारका रक्ष्याथं हे ॥ २॥ चै
1 इसी प्रकार तुरीय सवेमं अनुगत व्यापक उपारत
^ चेतन्थ अभेमा्ाका वाच्यां हे तिष्ठ उपाधिके परित्थागसे ६
‡ अधमाच्राका जो चेत्य मात्रा दोष रहता हं वह अधपा-
का ट्यां हे । इसी प्रकार चारां स्मनाधिकरण पाद् ~^
= ( चरण ) कै भेदको जाननेते परिपूणं अद्वितीय चेतन्- ल
च माज सद्धितमावके मदने सिद्ध होता रै ॥ ४॥ स
८.५
1 नि~ कः> 54 $
५>५३५०-० र ल ० ज ०9 ~ 9 ०४ ५.० 99 ५७२9 ० २०५५ भ 42)
नि)
04004600
गायक्रीमन््ाथभास्करः। ४
८
= (४०)
र ष न म भी भभम भमि ध
ध व्याहंत्यथः | ध
सस्ृतम् ।
6 (१) विषेण आहतिः सवेविराजः प्राह्मान ध
४ प्रकारीकरण व्याहतिः ॥ १॥
(२) भभवःसुवन्रह्य । भभुवःसवराप ओमरर
+= ~ क "क " =
.1 1 ्,: र. (4 ।
# > 1 तती ("तं ~
| ५ 7 क । ~ ४ (4 च 6५ र,
४ ( ३ ) बरह्मसत्ताव्यतिरेकेण भृरोकादिपरपचस्य ५
५ प्रथक्सत्ताऽनद्भमकारात्तद्रद्यव ॥ ३ ॥ ट
8)
[| भाषा। ` र
५ विरोषरूपसे आहति अथात् स्वेविराट्का बोध अथात् €
& प्रकार करने व्याहृति हआ ॥ १॥ .
अङ्कार न करनेसे वह निश्चय करके बरह्म है ॥ २ ॥ |
(1
( १) विष्णुस भा०। र
( २ ) महानारा० ८।१।॥ १४।१। १)
र
^. [=
€^ "नन्दा [र
८ ३ ) निणेयकलपवच्याख्यसं० भा० ।
प 982
४3
वः ।
न
<
ॐ &
(2,
ए 99990969
15: #।
| व्याद्त्यथः (४१)
| न म जिन कनि मि मि नं की व व सी ती सी य क मनीन सी म य द 2
५ सस्कृतम् ।
४ मव ५ प्च त
4 ( १.) भभरवस्स्वस्तथाः पूवं स्वय्मव स्वय
ध स्भुवा । व्याहता ज्ञानदेहेन तेनं व्याहृतयः
{~ स्व्ताः॥ &॥
¢. ( २) प्रधान पुरुषः काटो जह्य विष्णुमहे दवराः।
+ सत्वं रजस्तमरस्तिखः कमाद्वयाङ तयः स्मृताः ॥५॥
भूः ।
(३ ) भवतेः किविपि भूरिति रूपम् ॥ १ ॥
चः
अ क 14 आनि 1
= 8
9 १.
&4 4 ॥ +
॥"।
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10 4
» ०
भाषा । -
४ (६
4 सष्टिसे प्रवे स्वयं ब्रह्मनि ज्ञानदेहसे भयुषः स्वः कहा हे «
तिस कारणसे व्यादतियां कटी जातीं हं ॥ ४॥
प्रधान, पुरुष, कार, बह्या, षिष्णु, रुद्र) सक्छ, रज, «
तम तीनों कशसे उपहत्य करी गयी हं ॥ ^ ॥ ध
ह्व ष्णि -४- = 1 4 > नि इये [न
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#‡ न> 14, 4 ‡ (न
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न ~+ 9
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# | ^~ ट 4 32 ४ च
भः = श्र" धाठुत्त किप् मरत्यय करनस शरः एसा रूप
होतादे॥ १॥ |
५. ्
४ (१) यो० । याक्ञ० । अ० | छो ।
॥ि () करूभेपुराणे । उत्तरविभागे }.अ० १४ । शो ५४।
( २ ) बहचसन्ध्यापद्धतिभा० पर° ८।
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4 3 ५ $ [1.0
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त 619 "6४4 ऋ. १9. ० न १8 प ॥
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० ह न. % ८ क कः ४74 ८7 1 3 9
( ४२) गाय्रीमन्त्राथेभास्करः ।
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सस्कृतम् ।
‰ (१) भवतीति भूः स्वेषाभरपत्तिस्थानं लिङ्ग.
% रान् पाताखादिसतभृवनसदहितो भरछोकश्च ॥२॥
ध ५ ( २ ) भवन्ति चास्मिन्भताति स्थावराण
< उण च। तस्माद्भ्रिति विज्ञेया प्रथमा व्याह
® तिस्तुथा॥३॥
4 (३) रिति वै प्राणः । प्राणयति जीवयति
| | १५ चाणनः सः ( स उ पणस्य प्राण =[ति- &
! श्रतेः ) प्राण इद्र एव ॥ ४ ॥
= भषा।
य 4६4 ~
\*= । श्र. & १४३
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४१ कः क 1 „4 क मि
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॥ ॥ ^ [\ 41
॥
भवतति मूः ( प्रथिवी ) जा सवेकं उत्णत्तेका स्थान
[क
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8 लङ्क्यान पातालादि सप्त भुवन सहित भूटाक हं ॥ २॥
। 4 त - (^ ~, + "=
~ ग द
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हि त्रि 18} _
५ जसम चराचर भूत उत्पन्न हात हं तिसकारणत भूः - 1
८ परधम वाह्यति कटौ गड है ॥ ३ ॥ 1 । ्
दः क = ॐ
|. ~ (-2
श _ मूः यह निश्चय करके माण है । सम्पूरणं प्राणियोंको ज ५
५ 1 स त्राण कृतं दे । प्राण टी इश्वर हे ( श्रुति ) |
{& (ह इश्वर माणकामी प्राण है) ॥ ५। ४)
नि ~ =-= १ {4
५] ं "न ~~ 2 प १ ।
८ ( १ ) विष्ुस० भा०। |
(1 ^ ९) ० वोऽ वाक्च ।भ० ३ १६-१७। ध
& ( ८ ) तेत्तिरीयोप 9 ( शिक्षाध्याये ) अनु9 म्० २ । ्
20 9. ~; ति वी विः 4 "94288
701 ० = 1
€ ‡> {> ४: 9 9 7. "9 £ +~ & ॐ ष र [क +
‡ | (८ ६ हि ४ हः (९ & + पः ६० &< ~ $ 9 ‰् [ 4 1; 1 (9 ४ ग २९।
1 ९... र ¢ रः 8 ४ भ" ¢ वि ज भं ^ : (८ # ४ ~ "भ न &> ~ क 5. । 4. [> । - क ~ ~ < ~ ती. + ९१
११) १६ 1 4 ¢ +. +~ & ~ ष
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# २ ॥ क ; क कर ६;
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॥।
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„1४
1 ॥ 4]
ष स
4 (१ )भ्ररिति वा अग्निः) ( अत्राग्निरूप
खर एव )॥५॥
क्ष
न + 4.
&<&
~ =
१
। ~ न)
नर
~ वि ~
=
4१ ८ ह सदिति वेका वन तन ६)
~ (२) भवति- अस्तीति सदिति व्युदत््या +
शः +. =. 1914 | धः
-. भ्रिति सन्मात्रमुच्यते ॥ ६॥ १
:/ (३)भावयति स्थापयति विदवमि।त भुवः (
¦| (४) भवन्ति भूयो भ्रतानि उपभीगक्ष पुनः +
न = = ~ {रि ॥ . ५
:\ कद्पान्ते उपभोगाय भृवस्तेन प्रकातितव् ॥ ९ ॥
८ ॥ मावा {=
५ अथवा भ्रूः यह अग्नि द ओर आभ ही इश्वर ह १
८ जः अथं जा तीन कारम रह, तानी काट्म रहनस
+=
[1
५१५
>,
न,
सत॒ परमालसारूप दै ॥&॥
विश्वका जो स्यापन करे वहयुबःदै॥९॥
कृदपान्तम भोगके क्षयके पश्चात् फिर उपभोगकं टिमे
उसन्न होति है शस कारणत सुवः कहा गया ९ ॥ २॥
निन {~
५. = ++.
‡* ^ त न क. >-
1६ ८.१ >~ *१ १
1. ०,
> ॐ = / ५ १
छन "7 - ४ ~+
~ य नि 4
# ॥,
~>
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१५
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॥ |
क
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( १ ) तेत्तिरीयौप °( दीक्षाध्ययि ) अनु० ५० २।
(२) शङ्करभा०।
( ३ ) सायनम।० । |
(४) वृण यो० यान अ २।१.७- १८ ।
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क सदकृतम् । ्
(१ )रवरिति सवे भावयति प्रकाशयतीति 4
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व्युत्पत्त्या चिद्रूपमुच्यते ॥ ३ ॥ क
( २, भव इत्यपानः, अपानयति दूरीकरोति "
४ + * ~ +, ¢ © (१
सव दुःख मुम्नक्षणा मुक्तनां स्वसेवकानां धर्मा- +
त्मना यः सोऽपानो दथाद्ुरीदवरः ॥ ४॥ =
(4 © ६.४
(२ ) भूव इति वायुः । वायुरूप ईद्वरः॥५॥ ॥
स्वः। ` ५
( ४ ) सू. अवति प्राप्नुवते, इति स्वः १॥ '
| भाषा
खः यह सनक मकारा करता है, इस उ्युत्पत्तिसे चैत-
न्यरूप कहा जाता है ॥ ३ ॥ |
_ सदः अपनवायु दैन समुधो, जीबन्धुक्तो, सपने +1
स्का ओर धमौत्मा्ओंक सर्वं डः्वोको दूर करत। 2 वह
अपानवायुरूप दया श्वर है ॥ ४ ॥ ४
सुवः यह बायुरूप है, वायु ही श्वर है॥ ५ ॥ ध
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१. . अवति' का अथ परिपूर्णं है, भली मकार परिप्र्णं
& दानसं स्वः कहा जात। है॥ १॥ (
न (२) ेततिरीयोप० शीक्षाध्याये जनु० ५.१० ३। ४
(३ ॥ तततिरीयोप ^ रीक्षाध्याये अनु० ५० २।
3 ( ) _
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१
सस्करतम् । |
। # (१) स्वयन्ते उचायन्ते परकटाभवन्त देह-
+ देवता यतः तत् स्वः ब्रयाखशत्कणट्दवताद्यः
५ स्वर्लोक इति ॥ २ ॥
य,
( २ ) सवरित्यादित्यः। अदित्यरूपेद्वरः॥॥
( ३ ) रीतोषणवृ्ितेजांसि जायन्ते तानि वे
¢ ततः । आख्यस्स॒कृतनां च स्वखाकरस्ल उदा-
1 दतः ॥ ९॥
4 ~ ~.
॥॥ (१. 14.59. । ।1
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स्र्यन्ते-देहके देवता जिक्षमे प्रकट हौ उक्तके स्वः
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कहते हँ अर्थात् ततीः कोटि देवताओंका स्थान स्वलोक
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श! ॥ १
५ ६ र
५ ट ॥ ४
सुषः यह आदिसय हे आदित्यदही इईश्षरदहं॥३॥ ध
| रीत, उष्ण, वृष्टि, तेज) जिपस उत्पन्न हाते दहै बह
पुण्याटपा पुरुषोका स्थान स्वगेखक कहा जाता है ॥ ४ ॥
( १ ) विष्णुस भा०।
¦ ( २ ) तेततिरीयोप० शीक्षाध्याये अनु° ५ म॑०२।
4 (३) बर° योऽ याज्ञ° अ० ३।१८-१९ ।
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4 ६१, स्वःराब्दो हि सुखवाची प्रसिद्धः) ध
६ (व
‰ तङ्क्तम्-पूणा भूतिवरोऽनन्तस॒खो यद्रयाहती- च
~ सितः॥ ५॥ र
५ ( २ )स्वरिति व्युत्पत्त्या सष सर्वेनियमाणस॒ख- + `
५ स्वरूपमच्यते ॥ ६ ॥
|; > ८5}.
& (५३) सुवरेति व्यानः-व्यानयति चेष्टयति ~.
५ / ~प ९ | श |
& प्राणादेलकटं जगदमिव्याप्य सल व्यानः सवाधि- +
८. (9;
‰ छन बृहद्र ॥ ७ ॥ ध
५ भाषा । ्
५ स्थः रोष्द सुखवाची प्रद हे यद कहाहै। प्रेण 4
= एशवर्मश्रष्ट अनन्तसख जिसमे हो वह स्वः व्याहृति हं ॥ ९॥
4 स्वः इस व्युत्पत्तिसि खट सांसे कथित सुखस्वरूप ध
श्रु कहा जाताहे॥ ६ ॥ ६
स्वः यह व्यान वायु ह, जा जगत्म व्यापक टकर लं
र प्राणादि स्वको चषा कराता है बहे व्यान वायु सतक
॥ | न
१ अधिष्ठान व्यापक त्ह्महे॥ ७॥
( १) बहंचसन्ध्याभा० पृ० ९।
(२) शाङ्करभा०।
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( २ ) तेत्तिरीयभा० शीक्षाध्याय अनु° ५ मे ३ । र्
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४ | गायच्यथः । (४५१,)
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६ गायस्यथः ।
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^ (१) तदिति अव्ययं परोश्चाथं \॥ १॥
& (२) तदिति टु्तषष्ठयन्ते भगे विशेषण
५
छवा\॥\>॥ ।
५ ( ३ ) तच्छचव्वः स्ववुद्धिभेदशतः अतिदूरत-
^ मेऽलयुत्कषाख्येऽ्थं वतेते ।॥ ३ ॥ [8
“ (४) तच्छब्देन भत्यग्भरतं स्वतस्सिद्धं पर ध
¦! ब्मोच्यते ॥ ४ \ ४
४ भाषा
^:
† तत् यह अव्यय पराक्ष अथेमे है अथेत्त् जो दिखलाई त
४ नद्॥ ^ ॥ ¢
* तत् य ्षषष्ठन्त दै वा भेशब्दकां विशेषण हे ॥२॥ ` ‡
^ तत् रब्द् अपनी अपनी बुद्धिके भदसे अति दूर अंति
४ उत्क ( अति श्रेष्ठ ) अथम् वतेमान् 2२॥ ?॥ ध
५ शब्दस आत्मरूप खतस्तिद्ध॒ परब्रह्म कडा 4
ध जाता ६ ॥ ४॥
+ ( १) सन्ध्याभा० ।
५] (२) तारा०)।
४ ( २ ) विष्णु९ भा०।
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( ® ) राङ्करभा० ।
५
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1.
५ (४८) गायजीमन्तरार्थभास्करः।
ध भ भिरि
| सस्करतम् ।
५ ५
६ (१) तत्, तस्य सवासु श्रुतिषु प्रसिद्धस्य ॥५॥
५ ( २ ) ओंतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणच्िवि- &
४ ५, ५
£ वरस्स्न्रतः | ] & ॥ ॥ । -
५ सवितः । ध
क । र इः = ५
(३ ) षुञ्-प्राणिप्रसवें इत्यस्य धातोरतद्रूपम्, ¦|
५ सनोति सूते वा उत्पादयति चराचरं जगत् स ४
~ सविता सूर्यमण्डलान्तर्ग॑तपुरुष ईंदवरः ॥ १ ॥ |
४ भाषा । {
तत् उसका-जो सष श्चतियोमं प्रसिद्ध दै ॥ ९॥ र
५ , ॐ ततं ओर सत ये बह्मके तीन प्रकारके नाम कदं गये
& है ऽसतते "तत् ब्रह्यक। नाम है ॥ ६ ॥
ॐ ४ 7 रि &
र 1 ~+ ६४।8., ;: 4. द ७ "- „€
पुः धातु प्राणिके उत्पन्न करनेके अथेमे है, इस धातुसे
विता यह् रूप बना जां चराचर जगतको उतपन्न करता
[भ ५9. ५८ + च [च ~ #
वह सिता देव सूयमण्डलकं अन्तगेत पुरुष इश्वर ६।१॥
१ ^
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( १ ) सायन० ।
(२ ) गीता १७३
(८ ३ ) भारद्राजभा० रावण० |
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५ गायञ्ययथेः । ( ४९ )
। संस्कृतम् ।
| २ __ 6 6 ७ १
( १ ) षु=षरसवेदवययोः, सवेवस्तूनां प्रसवः !
उत्पात्तस्थाने सर्वेवयस्य च ॥ २ ॥ |
( २ )ष=प्ररणे-सवति स्वस्वव्याषारे परयति ¦ ध
= हिरणयगर्भोपाध्यवच्छिनः ॥ २ ॥ |
( ३ ) सतच्-जगतखष्टरि परमेदवरे ॥ ४॥ `
( ४ ) सवनात् सवेता ॥ ५ ॥ ्ः
भाषा ।
¶† षु धातु उत्पति ओर देथ अर्थम है इस कारण स्व &
#‰ वस्तुओंके उत्पति ओर रेश्वथका स्थान सविता देव दै ॥२॥ 4 ।
$ ष् धातु प्ररणा करनकं अथेभं है, जो सबको अपने &
छ अपने व्यापारमें प्रेरणा करे वह् सविता प्रेरकं अन्तय।म) &
विज्ञान आनन्दस्वरूप दिरण्यगभे उपाधिमं व्यापकं ६ ॥ २३॥ &
| त्रच प्रत्यय सरू धाक जगता ख।टकता परमश्वर्कं अन ह
मे हे॥४॥ प
पाटन करनसे सविता नाम हआ ॥ ^ ॥
(१) विष्णुसं० भा । मारद्राजण महीधर० ¦
(२ >) महीघरभा०।
$ ( २ ) वाचस्पत्ये ।
¶ (४) भेच्युप० ६।२५।
क
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ल (५०) गायज्रीमन्ब्राथभास्करः \ र
[६] मिपि ध ५
£ ५
ध ८१) सविता सवंभतानां सवेभावांश्च संयेत ॥
& सवनास्पररणाचेव सविता तेन चोच्यते ॥ ६ ॥ ८
ए ८ २ )सविता वे प्रसवानामीदो ॥ ७ ॥ ६
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सयं टयम्पाप्नवन्ति यः सयः सोऽहभव च ॥ ८ ॥ ¦
( ४ ) हिरण्मयेन ` पात्रेण सस्यस्यापिहितं
1 (३ ) संयावान्त भतान सयण पारुतानं तु
49
६ मुखम् ॥ योऽसावादेत्य परुषः सासावहम्र ॥ ~ ॥ <
व
् - भाषा ।
०
£ सबमूताका उद्पाठक. ट आर सवे भावाकी उतपन्न
। करता हे । उत्पन्न आर प्ररणाकरनेसे सवेता कहते ६ ॥ ६॥
8 ग
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कु
गेम ~> $~ 4 &
॥। (वे
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सर्वाधिका ईश्वर सविता ई ॥ ७ ॥ ८
& सूयेभगवानसे सवखष्टिकी उत्पाते पालन ओर संहार ५
८ हाता ह, जा सुयका स्वरूप हं वहा नेश्चयकरकेमे दू ॥८॥ ५;
& _ तेजोमय ठकनेसे सत्यरूप परमात्माका खख वका हे। 4
(जा पुरुष सुयमण्डलम ह वही मटर ॥ ९॥ [र
र (१) ° बो° याज्ञ° ज ९।५५ । सायन० । त
# (२) हृष्णयजुः। ८
4 ( 9 ) सूयाप० । <
त (२ )मेच्यप० ६ । ३५ । न्
् 4 1 ५ ज. ‰ न, न्व 7, ० त्क पि ~ (5 <.
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गायञ्धथः । क.
संस्कृतम् । रु
+ (१)यएषोन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो
4 हद्यते हिरण्यदमश्चार्हिरण्यकेरा आघ्रणखात्सवं
एवे सुवणः ॥ १० ॥
4 ( २ ) आदित्यमण्डले ध्यायेत्परमास्मानमव्य-
यमू ॥ १९१॥
, (३) सते सकरुजनदुःखनिवृत्तिहेतु ब्रा ज
+ नयतीते सविता ( याभरादेत्यस्तपाते रारेमाभ- &
“4 स्ताभिः पञन्यो वषति-श्रु° ) ( आदित्याजायते ्
:
४
“ बरिदषटरन्नं ततः प्रजाः-स्मर० ) ॥ १२ ॥
भाषा । ¦ ध
4 जो यद् सू्ेमण्डलमें तेजोमय पुरूष सुषणेङमश्चु ओर
¶ केशबाखा देख पडता है बह नखसे शिखातक तेजोमय
५] ह् ॥ १०॥ | ६
ध आदित्यमण्डलमे अन्यथ परम(त्माका व्यान करं ॥१९१॥ €
{ सकङजनके दुःखके निबत्तिका कारण सृष्टिक जो करे &
$, बह सविता ( सूय्येभगवान् ) हे ( जिन किरणकि आदित्य &
५ ५ भगवाच् तपत हं उन्द किरणों दारा जक रखीच करके [क
भेघरूपसे बसोते दै-ति ) आदित्यम बृष्ट, वृति अन्न (-
ओर अनस प्रजा उत्पन्नं होती हं ॥ १२॥
( १ ) छन्दोग्योप० । अ० १। ख० ६।म० ६।
( २ ) रौनक ० ।
( ३ ) स्ष्याभा० |
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गायन्मन्वाथेभास्कर, ।
१ कवक क्छ "वकर भक 7 वक ¬ 9 ¬ क
सस्करतम् ।
( १) देवोयं भगवान्भानरन्तयांमी सना
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४ 1 ॥ ८5 ५ + | = 4 1} द 3.2 स=“ ईः ॥ धी 4 9" 4 " क -74-> =+
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ऽ तनः ॥ १३ ॥ र
¢ (२)एष भरतास्मको देवः स॒क्ष्मोऽन्यक्तःसना- 4
तनः । इ रः सवेभतानां पर्भो पजापातेः।१४॥ &
५ नमः साते जगदेकचक्षषे ज गस्रसूतिस्थिति 1
त्र नाश्ञेतवे॥ जयीभ्याय न्रिगुणास्मधारिणे विरिञि 4
= नारायणश्च करास्मने ॥ १५ ॥
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॥ 4 1४1 ॥
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वह् सूयं भगवान् अन्वयामी ओर सनातन देव हं ॥१३॥
यह भताव्मारूपष देव सुक्ष्म, अव्यक्तरूप ओर सनातन
सप्रभतकि इर, परमेष्टी मजापाक्ते ( बह्मा ) है ॥ १८ ॥
4 १ ^ (क~ १ 0
॥1 गि 1.4 #।।॥ = क |
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४ उन सविता सूरथदेषकों नमस्कार हे जो जगत्के एकं नेत्र +
८“ ई जे जगतुक्े उतवा, पाटन ओर नारके कारण दै, जो 4
= ब्रहमा-िष्य॒-मेशरूप, मिराणरूप धारण करनेवटे ओर ¢
| तीनों वेदक खरूप द॑ ॥ १५ ॥ [१
“आ -----नत्कलतन्दलं - व |
| ( १) सयेपु° अ० १ शो° ११। 1
3 ( २ ) भविष्यपु०।
4
| ( मां तत्सवितवेरेण्यप् ॥ १६ ॥
१५ + 1 {7१ ग ४ र}
1*- ¶5./1 " कचः # चि २ र
4, ~" 1-9८-9 ~~~ - 3 - +
(5 "नै =" [1 (41
6 आ
न= ९ 9 स
गायञयथैः ( ५३.) 4
ॐ, =, क 1
संस्छृतम् ।
॥ यन्मण्डरं ज्ञानघनं त्वगस्य बरोच्यपञ्यं ध
& त्रिगुणाससरूपम्पसमस्ततजोमयादेव्यरूपं युनातु
‡ मां तस्सवितुवरेण्यम् ॥ १७॥
{७ ,
५ | न
(8 भाषा) (
& ्
1 स
९ ज्ञानघन, अगम्य) तीन टाकते पूञ्य, रजोगुण-तमो- 4
“+ गुण-सतोगुणर्प समस्त तेजोमय दिव्यस्वरूप सेके ४
4 वणेनयोग्य जो सक्षिता देवा मण्डल है वह सुञ्षफो पवित्र ^.
न
~
५ करे ॥ १६ ॥
|
--
४4242
६ स्वस्त भौमं व्यापक विष्णु भगगावका आसा परमधाम
« विश्चद्रत्छ (तज ) रपयोग दारा सकषम बुद्धिवाठे महासा-
^ ओके माप्त होनेयेग्य सते उपासनीय देसा जो सूभेभगवान्
1 का मडल हे वह सुञ्षको पवित्र करे ॥ १७ ॥
86
श 89.
#
गा 696 1606006 ध
( ५४ ) गायत्रीमन्बाथभाकरः 4
„9 को 4) 4 को) क -क>-१, क~ 9 4 == -क>4 + क~ 4
च ॥ 6 च ै (>) "न+ गकर "नक ११" 941 "नशा 91 > क > गर ॥ र
संस्कृतम् ।
= [ _ अ
& (१) नत्वा सूर्यं परं धाम ऋग्यज्ुःसामरूपि- $
णम् । परज्ञनायालिटेशाय सप्तश्वाय तरभ्रूतये ॥ ।
नमो व्याह्टतिरूपाय तमोङ्कारः सदेव हिं । तामृते |
= परमात्मानं न तत्पदयामे दैवतम् ॥ १ ॥ (2
श, =, = ^~ = क 4
॥ (२) अशं तै देवः सवितेति ॥ १९॥
# (३) तदक्षर तर्सवितुवेरेण्यम् ॥ २० ॥
क भाषा। (१
= £
® परमधाम, ऋग्यजुस्खाप-वेदस्वरूप सूभैको नमस्कार
प करकं ज्ञानस्वरूप, सेश्वर, सते घाडकं रथ पर् १९११७ प
< अद्या-विष्ण-महेशस्वरूय, व्याहतिरूपष सधको नमस्कार है 4
& आप सदेव अकाररूप हँ तुम्हारे परमात्मस्वरूपक) छोड
3... ।
॥ 2 ~ म (ऋ
|
3 द,
++" न [
4 += “न १४५
4. 19
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निश्चय करके यह देव सविता हे ॥ १९ ॥ प
{ वह श्रेष्ठ सविता दे वह अविनारी दै ॥ २०॥ प
५ 112 1149110 41. 91141 अ
८
न (१) सूर्यपु० अ° १।१३।३३।३४।३७। (र
‡ (२ ) शतपथत्रा० । ५
‰ (३) सपेताइवतरण०। ४।१८। ५
८
प # 8 4 नरि, 406 :# धन 40 शश ध्रः
न, 51116 ४ 458
+
46४ 1
1 ध ग(यच्यर्थः । (९९) भ
0 4
८ संस्कृतम् =.
९ ८ १ »सविता वे सवस्य प्रसविता आप साव-
8 तारमाह सवस्य पसवितारम् ॥ २९) £
(२) चन्द्रमाः सविता भ्रण प्व सविता ¢
# विद्युदेव सविता ॥ २२ ॥ ध
^ (८३ ) सवितुरितिस्ष्टिस्थितिर्यलक्षणकर 1 ध
।! सर्वपरपञ्चस्य ससस्तद्रैतविश्चमस्याधिष्टान कल्यत
4
( यतो वा इमान भतालं ज्ञायन्ते येन जातान
,! जीवन्ति यस्त्ययन्त्यभिसंविशन्ति तदविजिज्ञा ५
,\ सस्व तटद्येति-तेत्तिरीय०मृ०च०अ०१) ॥ ३ +
५
५1 भाषा ) ध त्
{\ निश्चय करफे सविता सब सृष्टिक्ता उत्पन्न करनबाट। है। श
+ अभर सविता कहते है, आशि ही सवका उतत क ध
५ बाला है॥२९॥ ५
चन्द्रमा सवितारै, प्राण भी सविता दै, वदयुत् * +
2 सरिता दे ॥ १२॥ ५
च खृष्टि ( उत्पत्ति ) षाठन रयरूप सवेप्रपचका अथौत् 4
| समस्त दैतविध्रमका आधारभूत सावता है ॥ (सत्त ध
4 यह सभरत उत्पन्न ओर पात हते ह जिम भवे होत ¢
^ दै तिसके ज।ननेकी इच्छ! करो वही बहम ९ › + --- ३)॥ २३ \ ५
4 (१) निरुक्ते दैवतकाण्डे अ० ७ पा० =^“ ९। ध
५
(२) गोपथव्रा ० । पूथैमगे । प्र० १ व्रा० ३९ । ॥
४. | ( ३ ) राकृरभा० उव्वट ° विद्यारण्य° । >
‰
+ =.
[) शभ
(4) (५
जी
व
कह ई
६ द
ह~ ~
४
र ध
भ
जो ऋ
10614000 16 19
(५६ ) गाय्नीसन्जाथभास्करः ।
संस्कृतम् ।
( १) एष हि खल्वात्मा सविता ॥ २४ ॥
(२) संरक्षिता च भरतानां सविता च ततः
स्मृतः ॥ २५ ॥
(३9 सते सकटश्रर्थासि ध्यातणामिति स-
विता ( उबन्तमस्तं यन्तमादिव्यमभिध्यायन्
कृवेन् बह्यणो विद्वान् सकलं भव्रमदनुत-इति
श्रतेः ) ॥ >२६॥
भाषा)
व
3 निश्चय करकं यहा रविता दव सव भताका आता
& रे ॥ २४॥
~ सच भरर्तोकी रक्षा करने सविता नाम इभा ॥ २९ ॥
, {र धान 5 रनवाटेके सै कल्यार्णोको उत्पन्न करनेके कारण
। (न सवित्ता नाः हआ ( उदय अर अस्त समय सूय भगवा-
| १ चका ध्यान करता इअ वद्राच् बह्यण सवै कल्याणकं
क प्राप्न करता ह-यहश्चतिह) ॥२६ ॥
( १) मेच्युप ०६ ८।
(२) न्र°यो० या्ञ० अ०९।९१ |
( ३ ) सन्ध्यामा०।
4.
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वरेण्यम् ।
संसृतम् । |
( १ ) ( एण्य )-प्रधाने प्राथनीये चयद्वर ्
वतुम् अरम्, अतिशरे् तदरेण्यम् ॥ १ ॥
८ २.) वरणीयं प्राथनीयम्) जन्मभरलयुदुःखाः
चै ॥1 ५ ॥1
६८ ~ 7 अका ~ 11
व ॥ ५.8 र 4 91 ध 1
४
00
ष्ठि
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५ शना नाशाय ष्यनिनोपासनीयम् ॥ २ ॥
१४
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~ ~> - ९, [॥
[6 णै
( ३) पुरुषार्थकािभिरथ्येमानम् ॥ ३ 1
भाषा ।
एण्य प्रत्यय युक्त वजयात् प्रधन् अर प्राधनय् अथे
+ - किन्न
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® दै, जो वणेन करेनके योग्य अतिश्रेष्ठ दे १६। बरणय दा्दसे ॥
^ कहा गया दहै ॥ १॥ 1
/ वरणीयनप्रथमीय अथेमे हे अथात् जन्म, शट्यु- ५,
| दःखादिकके नाश्च-नामत्त छान प्रक उपासना करन ध
‰ योग्यहे॥२॥ ९
नै च
। परषाधरकामनावारोमे प्रथित है॥ २ ॥
५५ 0 + र~ ५
५
‰ (१) बाचस्पये।
(५ ( २) सायनभा० भारद्राजण० रवण महीधर ° ।
वु ८३) तैत्तिरीय स० भा० गु° ४ धरण ५२।
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१५:93 4 * 9 0 णन ८ 4.19 2 १ ८ $ हुः & ड) 1 ‡
7 4090 धप
4 (५९८ ) गायत्रीमन््ाथेभास्करः ।
ध षेत् 9 सरकम् शः
(। (१) सर्वैरुपास्यतया ज्ञेयतया च सम्भजनी- |.
(1 यम् ॥४॥
॥ ( २) वरणीयमभदगसम्यमित्यथः ॥ ५ ॥
( ३) सवेवरणीयं निरतिक्ञयानन्दरूपम् ॥६॥ ५1.
(९ ) वरेण्यमाश्रयणीयत् ॥ ७ ॥ 4
(५ ) वरेण्य वरणीयञ्च ससारभयभीरुभिः ॥ '!
आदित्यान्तगतं यच्च भगांख्यं वा स्मक्षभिः॥ < ॥ `
४) + र = क
000
क ह ~ रः ५ न 1.
४८.६७
1... ण &
सवेप्राणियों करकं उपास्यभाव भौर ज्ञयभाव करके 44
ए चन्तनकरने योग्यहे॥ ४॥ ६
वरणीय=अर्थात् अभेद ज्ञानकरके जाननेकं योग्य है।॥५॥ +,
सके चिन्तन करनेकै योग्य परमानन्दरूप बह्म है ॥६॥
वरेण्यम्-आश्रय टेनेके योग्य है ॥ ७ ॥
ध वरण्यम्=तेसारके भयसे डरे हृए परुपेति वा सुक्तिकी |
# इच्छाव जर्नेसि आदित्यकै अन्तगेत जो भगे नाम तेज ^
है वह प्राथनीयह ॥ ८
त्रिं (१) मारद्वाज््र° ।
(२) वि० स०भा०।
(३ ) रकरभा० ।
( ¢ ) विद्यारण्य० ।
( ५५ ) यो० याज्ञ ° ९ । ५8६-५७]
¢ २
ध ~ +. = +, ~ 9 त र न (2)
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06665606 41546 ५
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४
६ यथः (५९)
भा 8
संस्कृतम् । ध
( १ ) वरेण्यं सवतेजोभ्यः ्रषठं वे परम पदम् ।
४) % गं काभ भ © + च्व १ ६
स्वगोऽपवगंकामेवां वरणीय सदेव हि ॥९॥ ।
{\ (२) वृणते बरणाःथत्वालायस्स्वन्नादिवजितम् । 4
\ निस्य शद्धे बुद्धभेकं सत्य तद्धीमदहीदवरम् ॥१९॥ ५
8 ५
(‡ (३) सवितुर्स्वात्मश्रतन्तु वरेण्यं सवेजन्तुभिः । ~
(~
<~
^ भजनीयं द्विजा भगैः तेजङ्चेतन्यलक्षणम् ५९१ ॥ 1
^ (४) वरेण्यं सेव्यम् ५१२) व
(4 भाषा ।
! वरेण्यम् पएवेतेजोसे श्रे परम्पद् - ह ॥ स्वगं तथा &
“^ मोक्षकी कामनावटे पुरुषों सदेव प्राधनीय है ॥ ९॥ |
‡ वृणुते ( वरणा होनसे ) जाग्रत्खसादिसे बाजत, 1
%‰ नित्य, खद, बद्र एक सतयरूप तिक्त ईश्वरका. ध्यान ह
% करतार ॥ ९० ॥ ५
व सविता दषा आत्मरूप) समैजन्तुओंसे प्राथनीय 4
ध ेसा जो भं तेजन चेतन्यरूप हे बह दिना द्वारा भजन
4 करने योग्य है ॥ ११॥ 8
८; वरेण्यमु-सेवाकरनेथोग्य है ॥ ९२ ॥
५ ( १ ) अथिपु° अ०-१६ । ५।
प्न (२) अभ्निपुराण अ० २९६ ्ो° &
ध ( २ )) स्कन्दपु० सूत्दितायाम् ।
4 (४ ) खण्डराजदीक्षिति सं° भा० ।
क
(>. ते & >+ + {~~ > ह 09) वि ने निः 8८959. नि ध
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4
न + 2 न 0 2
भगः
सस्कुतम् । _ 4
८ १ )भाभिरीतिरस्य ईति भगो भजयतीति 6
वैष भगः ॥ १॥ |
थ ^. ५९ £
(२)भस्रो-आमरईनेःभृजी भजन इव्यतयोधां
त्वोभर्मः । भजतां पापभञ्नहेतुभतभित्यथः ॥
श्राज्ञ दीसावित्यस्य धातोवां भगः तेज इत्यथः) २॥
शबर
५.५ „14१ ॥ १1 ॥
४
1 ~. +~ शि ~
4 4 श्रः:
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भाषा ।
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२
भातगति-किरणदारा गति अथात् विषयन्याधति है
जिसकी वह् भगं हे अथद जगते नाश करनेकं कारण
भर्ग नाम इषा॥ १॥
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(८.3
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भञ्ज धतु आमदंन अथंपरं ओर अज्ञ धातु भजन अ
है इन दोनो धातुओंसे भजन करनेवाखोके पापक
भञ्चनका कारण होसि भगे नाम हभ । आजु धातु
सै
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~
नि
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५ दप्ति अर्थे टै हस धातुका रूप भगं है, भगैङा अर्थ ४
1 जटहै॥२॥ |
त ~ 2 9119 306. पवि ८2)
५ ( १) मेच्युप० ६।७। ध
¢ (२) भारदरानर | ५
(व
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न्नः
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१ ॥
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गायञ्यथ॑ः । (६१), 4
सर्कतच् । &
( १) श्रस्ज=पाके, असुन्? भ्रस्जो रोपधयो- ‹
मन्यतरस्यान्निति रोपधयोलोपः रमागमः €
स्यङकादित्वाल्कत्वप्र् ॥ ३॥
( २) श्रस्जः<घञ्, आदित्यान्तगंते रेद्वरे ध
तेजसि ॥ ४॥ -
(३ ) पापानां तापकं तेजामण्डकम् ॥ ५ ॥ 4
( ४ ›) अवियादोषभजैनात्मकज्ञानेकविषय- &
त्वम् ॥ ६ ॥
भाषा ।
भ्रसज धातु पाक अर्थे असुन् प्रत्य “ भ्रस्जो रोपधभो-
रमन्यतरस्याम्" इस सूत्रसे उपधाक्रा खोप पिर रमागम
्यङ्क्छादिसे वव होता है इससे भगं सिद्ध हइ ॥ ३॥
( घञ् ग्रत्यययुक्तं भ्रस्ज् धातु) सूयमण्डङान्तगेत ईश्वर
48 ¶ (आः नि नू
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सम्बन्धी तेज अथमदहे॥ > ॥ त
पपकं तपने ( नाश करने) बाडा तेजरूपमण्डक ९
भरगेह्॥ <^ ॥ रज
आव्याके दोषोका नार करनेवाखा एकं ( केवर ) }
ज्ञान स्वरूप भगंदे॥६॥
( १ ) गृह्यपरिरिष्ट° ।
(२) तारानाथकोशे ।
( २ ) सायनभाष्ये |
९ 9 ) शोकर ° महीघर्० ।
न ^.)
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>> 2 9 ४ -39-{> &् 2-- = = & ९ £
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4 (६९) गायन्नामन्त्राधभार्करः । र
< मि न म म भी क भि द |
सस्कृतस् । ॥
+ (१) भर्गोऽविद्यातत्कार्थयोभेजनाद्धगेः ।
% स्वयंज्योतिः परबह्यत्मकं तेजः ॥ ७ ॥
( (२)श्रस्ज पाके भ्वेद्धातयंस्मास्पाचयते द्यसो ॥
१ भ्राजते दीप्यते यस्माजगदन्ते हरत्यपि ॥ < ॥
८ (३) भनैन्ति नद्यन्ति पापानि संसार- \
, जन्ममरणाविदुःखगरूठानि येन असौ भगः ॥ ९॥ +
चै
2 विन
^ व. ©~#.~
अ
4
४ ( ४ )पकारषदानन जगतो बाद्याभ्यन्तरतमो- ध
(‡ भञ्जकस्वाद्धगेः ॥ १०॥ क
ब ४
[९ भाषा। स
{ अविद्या ओर उसके कार्यौका नाद करने भगं स्वय- #
£ यह् भगे नाम हओ ॥ < ॥ [१
पाष अथात् संस्ररू¶ी जन्ममरणदि इःखका मूर |
(^>
८ जिसमे नष्टहो वह भगदै॥ ९ ॥
† प्रकाश्च द्वारा जगते भीतर बाहर्कं अज्गानरूप तमका `
2 नाश्च करनेसे भगं नाम हआ ॥ १०॥ --
ॐ (१) सायन० विद्यारण्य मद्रोजिदीण । +
ध (२) बरृण्यो य्ञ० ज०९। ५२-५३ । ४
1 (३) सं०भा०। 1
र (४) वरदराज०। 4
¢
¢ 4 । ।
र 4 य &} =. ~ 99 प थी ० 4 "9
४
गायच्यथ्ः (६३)
¶ 4
+ 3 23१ । ४ अकी रे | > > त व > त > +++ कर" + +~ क 1) क. ४ क > ४ मि क "नकर श (न >> 9 3॥
(61
स्स्छत्म् ।
( १) परकाशरूपं यस्प्रकारोन सवेप्रकाशः घरका-
राते । ( “न तन्न सया माति न चन्द्रतारके नमा
( क
विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः तमेव भान्तमनु-
+.
> ॐ
0 "8 १ & & ~ 4.44 ह
|
भ
1/1 1. ~ जव क) = 01 जक)
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६ भाति सवं तस्य नसा सवामेदं विभाते &
ॐ कृटोप< ) ११ ॥ \
4 6 ¢ <
~ (२) भगेस्तेजः-प्रकाराः प्रकारो ज्ञानम्, ¦
^ यच्िरपद्वं निष्पापं निगुणं श्चद सकरदोषरहित ;+
कं परमाथवज्ञानस्वरूपं तद्धगेः ॥ १२ ॥ ५ .
8 भाषा । ५
4 प्रकाशरू१ जिसके प्रकाशस स्ै मकाडित रै वह भगं 4
< टे ( यथा श्रुस्यथ) (न वहां सूय प्रकाश करता है न ५ |
4 चन्द्रमा नतारा न॒ विद्युत्) तो इस अभिका वहां क्व च
43 प्रकार टोसकता ह; उसके मका होने पश्चात सष ५
4 प्रकाशेत रीत दं ओर तेसौीके प्रकाशसे यह सवे म्रकारेत
८4; है-कठोप० ) ॥ ११ ॥ ५4
८३ भगै तेज है प्रकाश है ओर पकाशकज्ञानरूप है जो ,
{ग उपद्रबरहित, पापरहितः, निगणशचुद्सकल दोषरदित परिपक्र ‰4
८ परमार्थ विज्ञानस्वरूप बौ मग है ॥ १२ ॥ ६५
"न ्ः ~-~ ध
६ @). सन्ध्याभा०
ध (२) निरुक्ते \ तारानाथ० |
= ५) ह 4 (2 (~, ; & च न न ~ ६ = ~ग ^ & ~, भम) ~, इनन न
५९५, निव ज ०-०-०१ ~-9 -५
५ हद । ;
6,.
ध च्रे १ 1}
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09444949
१५
& (६8) गायक्रीमन्बाथभास्करः । ५
(= + क|
सु विमि यिप 0 म म ः)
( ्
स रक्तम् | १
५
( १) भ-भासयती्मद्धोकानिति ।
र-रञ्जयतीमानि भ्रतानि |
ग-गच्छन्त्यास्मिन्नागच्छन्व्यस्मादिमाः ~
~
५. (व
च ।, [ मः
1] #। ५
१
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#।. ©,
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0 भ्र 1
+ 2 ~ ॥/)
५ अनासतसमादरणसा भर्गः ॥१६॥
% (२) भेति-भासयते छोकान् रेति र यते प्रजाः ।
4 ग इत्यागच्छतेऽज खं भरगाद्धगे उच्यते ॥ १४ ॥ |
- ¢ भाषा ।
4 मन्दन ठोकाको मकाशित करता है ।
7 र= इन मूतोको आनन्द देता हे ।
1
2 >
( गजस कारण आतपा यह सव प्रजा सुषु ओर
^ , ग्रलय कालम. ठ्यको ्राप्त होती है, पुनः जिपकारण
~ आलि जाग्रत् ओर खष्टिकाटमे सब उत्पन्न हाती हं
प्व
( वह गअक्षरका अथ है तिस भासन रंजन ओर गमनोतसे ^
भी दाब्दं करके सवाटमाका प्रहण हं ॥ १३ ॥ ।
ध "भः स्वैटोकोको काश्च करता है र सवे प्रजाको 4
८\ आनन्द् देता है ग" बारम्बार लय होता है तिस॒ कारणम 4
५ भग कट्टता हं ॥ १४ ॥ |
नः
1
;
¦ (१) मेच्युप० ६।७।
# * (२ गत्रु० योग्यान्न ००९ छो ४९५] ४६।५०।५३।५४।२३।
€. गो; =
रः 04450076 04042448
~, ति
श ४6
= ॥ च
८
1
~ व {
श र „1
ल= 2 ~
१
(ध
= गायञयथः । ( ६५ ) ^
ध (1. ध
॥ संसृतम् । ४
इ = 6 = ध
४२ भ्राजते च यंदां भगः पुरुषत्वाच पूरुषः । [8
स ९. ५ आः ० ~ ॥
(1 सवात्मा सवेभावस्त आत्मा तन नंगद्य्तं ॥९ | ५
५ काराग्निरूपमास्थाय सक्ताः स्तरद्विमभिः।
ह ^ भ्राजते स्वेन रूपेण तस्माद्धगं इति स्मत 4
५ {=
१ (सच्छे ) ॥ १६ ॥
श इईदवरं पुरुषाख्यं तु सत्यधसाणसन्ययमू।नगौ- {1
8 ख्यं विष्णसज्ञ तु यं ज्ञात्वा तमदनुते ॥ ९७ ॥ ¦
८ हद्ञ्योम्नि तपते ह्येष बाह्ये सृय्यंस्य चान्तरे । ¦
(+ अभो द्यधुमके द्येष उयोतिञ्चिज्रतर ङ्वत् ॥ १८ ॥
५ भाषा । &
म्रकाशरूप दने भगं नाम हं, परिप्रणें दीनसे परुष ‰‡ ¡{`
नाम ह, सबालत्मा जार स्वरूप रर्नस् आतपा करटा गया 4
॥ १५ ॥ &
कारामिरूपे स्थित होकर सप्ताचि अभिरूप ओर ^
५ सप्तकिरणो करके जो अपने रूपसे प्रकारित दह तिस कारः (~
णसे भगं हे ॥ १६ ॥ क
„ इश्वर पुरुष सत्यधमवाला अविनाशी भग॑नामके विष्णु |
ट जिरेको जानकर पक्षको माप होता दे ॥ १७ ॥ + +.
शु वह भगे हृदयाकरामे तथा वाह सूयैमण्डलनरं तप। यमान \¦
# हाता है र नाना प्रकारके तरगकणे नाई यह ज्यो तिरू१ |
भगे धृमराहेत आभरम् प्रकाशस्वरूप रे ॥ १८ ॥ ५९
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५
९ प > ~: ४ >~ ४ , (ज
<) भ~ क्व गन्म =, च ननौ क्क क) क › क) यी १ व्क ~क # > भ्वी कको १ ११-91-91) द भच + 1 + द, † र
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भ कुर गाग 24 ०70
1 2 (9 अ~ 9 ~= ५)
७९९ , गायन्नौमन्तराथभास्करः ४
० दः
सस्छृतम् । 8
<>
हृदाकादयं त यां जवः साधकेर्पगायते |,
एवादतव्यरू्पण बहिनभतसि राजते ॥ १९ ॥
तस्य चान्तगतं धाम सक्षम पाकारयमव च । ¢
८
स चात्मा सवभूतानां चतामाचरस्वरूपकः॥२०॥ `!
सवस्येवोपारष्टस्य प्रणा्पुरुषः स्ताः । २
+ [द [ ख <
भवभीत्यन्धकारेभ्यः रं करोति ततः रोषः२१॥ 1.
७ [र् [ ज्य ॐ £\ ५१
( १ )मण्डरं पुरुषो रदमय ईति तरय भग- ध
पदवाच्यम् ॥ २२ ॥ &
भाषा । {1
= © ज [4 क "१५
जो भगं दृद्याकाशम् जीवालारूपसे साधक पुरषो {|
करके कथन किया गया ह वही भगं बाह्याकारामे आदित्य +.
रूपसे योभित रे ॥ १९ ॥ ५
तिस आदित्थके अन्तगतं जो सक्षम प्रकारारूप है वही ^:
सव भूरतोका चेतनरूप आत्मा दै ॥ २० ॥ ५
वही भगं सर्वोपरि परिपृूणं हानेसं पुरुष कहा गया हे । “+
सी भर्भको संसारके भयरूप अन्धकारसे बचानेके कारण ५
हिव कहते ह ॥ २१॥ ५
सूर्यमण्डल, पुरुष, तथा (किरण यह तीनां भगं षदके ध
वल्ध ॥ 1॥1 0
( १ ) य्॒कयज्ः । वाजसनेयसंहिता । ५
र
०१ - ।
तवि ~ > न
944
५. |
(40440244:
त =, [श श्ये नै, न. ~ 5
ध] प १ न गा? ~} हि ~य हि ग ग< > =<>» ग
[॥ र = ॐ =
बः [अ
4१. से यङ नुद #+3
। गायः । ( ९७) &
५ ४, { क,
4४ | 4.५
कि
संस्कतम् ।
( १) वीर्य्यं वे भगे इति ॥ २३ ॥
(नि {4 1 ५ ~ ॥
1419 9
4 =
= ०५९ | ९
‰ (२) गायथ्येव भगः तेजो वे गायत्री ॥२९॥
४) 4 ©\ {५ >~ [ 8 9
( ३ ) तेजो वे बह्मवचसम् । गायत्नो तेजस्वां 9
+ वचसी मवति ॥ २५ ॥ ध
; ष, क कि इ
# (९) स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स ,'
ध एकः ॥ २६ ॥ ध
८ श ४ 4
क निश्चय करके बल भर्ग रूपरै॥२३॥ ¢
(4 = ¢ ^ (3 हे । ® ` 4.
~ निश्चय करके गायत्री दीभगेदै तथा तेज दी गायत्री ¶
दहे ॥ २४॥
1 74
८०५९
046४
निश्चय करके तेज दी जह्य तज है गायत्री तेज-
द
१ स्वरूप है ॥ २५ ॥ त
क 9 रं (२)
$. जो स्र प्राणिर्येमिं आलाहे ओर जो सुयमे हे वह
= दोनो एकह ॥ २६॥ ।
/‡ (१) शतपथत्रा०५।४।५। १। | £
+ (२) गोपथत्रा° रावण० पू० ॥ ५। १५६। ~ \ त्
१ (२) पेतरेयत्रा० अ १।ख०१।अ०५।. ¦ श
( ४ ) तैत्तिरीयत्रा० ब्रह्मवल्ली ख० ८। "श
स
(भ
+
४ (4
+
# ५
६
क
(९६८ ) गायज्रीमन्ताथभास्करः ।
<| संस्छृतम् ¦
& . (८१) आदित्यान्तगेतं यच्च ञ्योतिषां ज्योति
¢ रुत्तमम् ॥ क्ये सवभूतानां जीवभ्रतः स
{ प्तडतिं ॥ २७ ॥
च्यः र
{ (२) तज्ज्योतिः परमं बह्म भगेस्तजो यत
& स्स्मृतम् ॥ २८ ॥
४ भादाक्षावाति रूप हे भ्रस्जपाकेऽथ तस्स्घ्रतम्।
‡ ओषध्यादिकं पचति श्नाज्ञ दीप्तो तथा भवेत् ॥
भगः स्याद्धाजत इति बहुरं छन्द ईरितम् २९
ध. -1॥1 8,
४ ६ आदित्यकं अन्तगत जो सवे ञ्योति्योमें उत्तम ज्योति
है वही सव भूतोके खदयःप जीवरूपसे स्थित दै ॥ २७ ॥
| ष जेस कारणक्षे भं तजरूप है उसीसे वह तेज पर-
। € ब्रह्म हई ॥ २८ ॥
५ दीप्ट्यथक भाः धीता रूप भगं हे । जिससे ओौष-
+ ध्यादिक परिपक्त होतेदे श्रस्जः धुका रूप भगेहे।
+ द्[प्त्यथकं आ्राज्न षतिका स्प भगंदटे ( आर् प्रकाशरूप
41 भगक। वेदम बह त मरकारसे कथन किया है) ॥ २९ ॥
¢ (१) द° थो० याक्ञ° । |
& (२) अनिपु०। ० २९६। इलो ३; ४, ५, ९।
|
ध कः |
४ ~, (~, ~+ ध व ~
द, क ^ {4 ्\ । «१
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4 ५ = (* (१ # क८५ "च~.
क = ।
{2 ~£ ५.१६ त 8 5
:- 9 (द; ५.६ ५८ --०८9. --अदौ
8 ४ 046 0
(1. थ
॥ गायञ्यथैः \ (६९)
र #) |
ध सस्क्रतम् । ४
# रिषं केवितपठेति स्म शक्तिरूप पटति च । £
५ केचिस्सर्थं केचिदग्नि वेदग। अग्निहोन्रिणः३०
अग्न्याहदिरूषी विष्णुाह वदाद्। बह्म र्यत । ।
८ तत्पदे परमं विष्णोदेवस्य सवितुरस्ततम् ॥ ३१॥ ‰,
¦ (१) फतद्रह्येतदभतमेतद्धगेः ॥३२॥ 4
( २) भर्मः। अद्वयानन्वलक्षणं सवेजगदुपा- ध
दानं परिपूणज्योतिरूपं विभ्बस्थानोय च्य वाज्या- <
रतया पर्यवसन्नम्, णएतादग्ब्राह्य तद्रपस्ेनेतिं 4
ध
५ रोषः ॥ ३३ ॥ ५
५ भाषा ।
कोई भेको शिव कहते दै, कोई शक्ति निरूपण करते 4
4 है । कोई सभ ओर कोड वेदिक अआश्वो्री अग्निरूप &
@ कहते है ॥ ३० ॥
+ अमि आदि रूपी विष्णु, यह वेद आदिमे जह्मल्पस ^
ध कथन. किंयागया है वहे विष्णुदेव सविताका परमपद कंद।
। गया रै॥ ३९॥
4 यक्ष्म है यदी मोक्ष है यद भै ॥ ३२ ॥ ९
% अभर्-अद्रय, आनन्दरूपः सम्पूणजगत्का आधार, परि"
¶ पूण ज्योतिस्वरूप बिम्बरूप बरह्यवाक्यके अथेरूपसे सम्पन्न ^^
| ठेसा बह्यसम्बधी तेज यगंरूपसे कहा गया दहै ॥ ३३ ॥ ६
0 ` (१) भेच्युप० ६।३५। ९
६1 ( २ ) निणेयक्स्पवर्स्याख्य ° स° भा०। 1
वध
£
06614198 69
$$ (७० ) गायजामन्तराथभास्करः । 1
४ नी शी म भी भ मी भ ममम भी ५
ए
२ दवस्य | 6
रीः + ७
० सस्छतम् । प
ध ८
# (१) दिवु-करौडा-विजिगीषा-व्यवहार-युति- ५
‡ स्तति-मोद-मद-स्वन्र -कान्ति-गतिष, पचादयच॒
कः 4
~ इत्यच् पत्ययःदीव्याते भकाराते चराचरजेगत् ,,
४ स देवः प्रकाशस्वरूप वा ॥ १॥
(२) सवेययोतनात्मके आत्मनि परमेदवरे
ॐ अमरे ॥ २॥ ्
ध भाषा । 1
क आ
&
(देवु' धातु डा) विजगीषा ( जीदनेकां इच्छा )
व्यवहार, दयात, स्तात, माद, मद्, स्वप्र कान्ति, गाते इन &
` अथामं है । पचाद्यच् इस सूत्रसं अच' म्रव्यय करने पर 4
- देवता बनता हं । जा चर अचर जगतुकों प्रकाश करे 4
[न
मं
7
् वह देव है अथवा ज प्रकाशस्वरूप है ॥ १ ॥
क 9 = 9४ + = 94 न. == @ ^
ष्च सव प्रकारमिं, आत्मामे, परमेश्वरम, देवतार्भमि देव ^|
/# शब्द् घटित होता रै ॥ २॥
॥
† (१) षा पाठ०। मर्ाज० । सायन ° । रावण० ।
धृ ( २ ) वाचस्पतिको० शब्दस्तोमको० महीधर्० ।
~ = ~ 2. ~ & । ८
६ ष ध ॥ ४ नि दन ध 38 श ध्न् = &> ह; न
70 ग 004
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॥ गायञयथेः। (५९) 8
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र च्
दः ` = । दकः
५ स॒स्करतम् । (=
द
6 # चिः ए
{ (१) सवद्योतनात्मकाखण्डविद्करसम् १३॥ 4
(२) देवा दलनद्धा दीपना द्॒स्थाने मवति &
६; ~
(1 ख,
तवा॥४॥ .
६ 6/9 + = क ॐ ६
¢ (३ ) दाव्यते कोडते यस्माद्राचते योततं ध
वि । तस्मादेव इति परोक्तः स्तयते सवे- «4
॥ वतेः ॥ ५ ॥ य
द
। आषा) 0
ध = । चेतः (तव) (4
तरै सवका मफाशक, अखण्ड, चतन्यः एकरस देष' का ¢
4 अथंदटे॥८॥. | =
4 | १
देवः शव्द दानमे, प्रकाशा करम, वा खलोकके अथै- 4
५ महे ॥४॥ ८
ह 0 ‰ (3
४ जिसकारणस स्वगे क्रीडा करता है मकारा करता हे ~
+ इस कारण देव कहागया ह ओर जिसकी सच देवता स्वति
^ करते रं ५५॥ ¢
4 (१) रकरभा०। त्
1 ८९) निरुक्त दैवतकाण्डे ७ अ० ४पा० २ खण०। व्
म (२) ब्र यो० याज्ञ॒° अ० ९, | ५४ | विद्यारण्य ० । ४,
४ 1 ५ 8 ऋ
9
४9
9 = अन. ~
‰ (५२) गायत्रीमन्त्राथभास्करः। ध
कः (मा
५ सस्कृतस्र् । धु
५ ( १ ) रञ्ञ्वाकाराद्ीढयाति पकाश्चयतीति देवः &
५. भ्यातृहृदयारेन्क्मध्ये कौडतीति देवः॥ दीव्यति
† नन्दतीति देवः। अखण्डानन्देकरस इत्यथः ॥& ॥ ¢
ज (२) सवेभ्रतेषवात्मतया योतते स्तयते स्तव्यः 4
| सवेन गच्छति तस्मादेव „२
{ (एको देवः सवे्रतेषु गढः सवेव्यापी सवभ्रता- ¢
++ न्तरात्मा । कमाध्यक्षः सवेश्रताधिवासःसाक्षी चेता
~.
केवला नशुणर्च-इातं शवाद्वतरः। ११) ७ ॥ &
गिव
[=
| [व प
& रज्ज ( रस्सी ) कं आकाशम स॒चके भरमके सद्दा आभै- (च्
| छनि रूपत्तं ज। सवका प्रकारक हं वह् देव कटा गयाहे ।
{ ध्यान करनवाटेके हृद्यकमलमे क्रीडा करेसि प्व, कहा ‡
© गया ह! आनन्दित कता है इस कारण दष शब्द ९
(+ अखण्डानन्द एक रसक्ते अथ्महे ॥ & ॥ ५
/ सव भरतो आत्मारूपसे मकारा करता है, स्तते <“
.{ स्वाति किया जाता दै सब जगह आत्मरूपते पराप्त है इस ~
कारण देव कहा जाता है ( एकी देव सवैमूतोमे गद्य है ५
{ स्वैव्यापी ओर. सर्वभूतोका अन्तरात्मा है । कर्मोका
{ सवाम सत् मृताके निवास स्थान) साक्षी, सवको चेतन „4
4 करनवाटा कवर अर निगुण टे-श्वताश्वतर ६।११)॥ ७॥ 5
4 (१) सन्ध्यामा०।
4 (२) शब्दकस्पदुमे। ~
| न) ~ & ~ ^ 4 (4 9416 म {4 (4 (4 14 4 ५; नि <
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६ गायञ्यथः । ( ७३) ध
१ म 0 तपय 1
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ह धीमाहं । ।
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सस्करतम् । 6
८४
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धौ |
त (१) ध्यैनचिन्तायाम् । ध्यायतेलिड्) बहुं
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¦ छन्दसीति सभ्प्रसारणा (अ ) उ्यस्ययेनात्सनेषदम्। ¦ |
. ध्यायाभः । चिन्तयामः निगमनिरुकूविधानरूपण
६
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सनु
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श्वा निदिभ्यासं तद्िक्य कुम इति ॥ १॥
( २ ) धीड्-आधारे खड वहु छन्दसति
विकरणस्य लुका ध्यातुध्येयव्यापाराभिच्चस्वमेवं |
ध्यानम् ॥ >२॥
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अर ध ~ वल ज
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भाषा । स
धै" धातु चिन्तवन अथेमे दै ध्यायतेः लिडः बहुख
छन्दासि इस सूत्र सम्प्रसारण न्यल्पयसं करनं पर अत्मनः (ज
पद् इ. निगम, निरुक्त षिधानरूप नच्रसे चन्त्न करता
र अर्थात् तत् स्वरूपका ध्यान करता टर ॥ १॥
धौीडः धातु आधार अथेमे ह छि बदर छन्दा |
इस सृते विकरण का लोप हआ ध्यान कर्नाटक ध
ध्यान करने योग्य परमात्मासे अभेद हाना ध्यान कर [5 |
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१ ॐ 141 स प ४ # &
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( १ ) भरद्वाज गृह्परिरिष्ट | याज्ञवस्वय ० उन्वर ० । 1
(२) गृ्वपरिशिष्ट सायन० । विप्णु स० भा० । ४1
; व 4
(धः अ
~ ~ ०४ ~° =< ~
व 4 ध
€ (७४ ) गायत्रीमन्वाथेभास्करः । 1
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2 वि भमी मभ भभम 9
4 सस्कृतम् । 4
द) ^ [त र ट व्
~ (१) धीमहि-आत्मना आत्मरूपेण ध्यानं 4
¢ 0 १ जड ल,
वेयमकुमं । ध्यानम् नाम ““ सवेरारारषु चतन्य-
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स) + पे र) 23> +>. ~ ~- कग“ गि} ४
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कतानता ˆ ॥ ३॥ 6
( २ ) ध्यानैन हेया वृत्तयः ॥ ४ ॥ (1
ध ( ३ ) रागोपहि तध्यानम् ॥ 4 ॥ £
† (४) ध्यानेन भते मोक्षं मोक्षेण कमते सुखम् । ^
¦ सखेनानन्वद्रदिः स्यावानन्दो बरह्मविध्रहः ॥ ६ ॥ । |
॥ ४ आत्मरूप करकं आत्माका हम खाग ध्न करत् है । {2
२ <^
सभूतो्मे चतन्यका फैटाव देन।'" ध्यान क्हटाता
| 4
ध्यानसे वृत्तिर्याका त्याग करना चाहिये ॥ ४ ॥
किसी वस्मे अच्ररागसे युक्त हनेका नाम ध्यान हे॥५॥
ॐ
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श घ्यानस मज्ञ अर माक्ष छख तत्त हता ह खुखस ५
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आनन्दकी बृद्धि हाती हं ओर आनन्द ही ब्रह्ममति दहं॥६॥
ॐ जक
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ॐ
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( १) मण्डल्राह्मणोप० | १। १
( २) योगसूत्रपा° २। सू० ११।
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च (३) सांख्यसूत्रे अ० ३ सू० ३० &
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रु „€ ¢ ) रुद्रयामलोत्तरतन्त्रे प° २४।.१३९ । ३ । )
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गायञ्यथंः । . ( ७ 1
ध ४ म वि ॥
ध संस्कृतम् । 64
+ (१९) वय ध्ययिम-ध्येयतया मनसा धारयेम
< &‡
\ वा वयम् उपालीमह उपास्महे वा ॥ ७ \ ५
¢ (२) अहस्ब्रह्मत धोसाहं ॥ ८ ॥ ~
५ (३ ) बहमेव साश्षिरूपभिति तदछक्षणतय। 4
4 ध्यायितभपपन्नामेाते ॥ २ ॥ #
ध्यायते अनया ध्यान वा चः |
६.) €
4 ध्यायते सम्बरसारण च इतिं वय् सस्त्रसरण ४]
, र)
† हर इति दीधः ॥ १० ॥ ४
र भाषा। व्
श ध्येय पदूथैको हम छोग मनम धारण करते ह अथा [६
६५. ए 3
¶ हम्. उपा्तना कःते ह ॥ > ५
बरह्म ही साक्षेरूप है इस सक्षत +त करनवाेको ~
श ध्यान करना युक्त हे ॥९॥ |
{4 जिससे ध्यान किया जाय उक्ते ध्यान व् धा कतं ह {५
"धयायतः सम्प्रसारणं चै " इस स्स व्यक चकर
4 हीगया ता 1६ चना फिर “हलः” इस सत्र द्ध हागच। क
01 £
(र (क
¦ ( १ `कन्दपु° । भारद्वाज ० । सायन
(२) अभिषु अण २१६।१८।
(2
( ३ ) निर्णकल्पवल्ख्याख्य स ० भा० । ॑ 4
भिः
ण भ, ह $^ {+ ब॥ ~ द गि क्न प" ज
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् ( ७६ ) ` गाय्नीमन्त्राथंभास्करः । 4
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॥ ६)
धियः ¢
सस्छृतम् । £
( १) बुद्धयो वे धियः ॥ १॥ 61
८ २ ) धियो धारणवत्यो बुद्धयः (धीर्घारणा-
^,
वतो मधेत्यमरः ) ॥ २॥
( ३ ) धमादिविषया बुद्धिः ॥ ३॥
(४ ) कमोणि पिय इति ॥ ४ ॥
८ ८) धीश्चव्दो बुद्धिवचनः, कमेवचनो, वा
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वाग्वचनद्च ॥ ५ ॥ (त
1 माषा । ध
| बुद्धियां निश्चय करके धियः इ ॥ १॥ च
क्कः ॥ ॐ
4 धियः, धारण करनेवाली इद्धि ई, ( धी धारण करने- |
4 वाटी जुद्धिको कहते दँ, यह् अमरकोप॒क। वचन हे ) ॥ 1
ध धमाद विषृयााटी बुद्धिको धी कहतेदं॥ ३ ॥ ६
=) १
छ कमाके इद्धि कतं द॥ ४॥ ८1
1 धाराब्द बुद्धिवाचां कमनाचां अर वाक्राचां दहे ॥९4॥
॥ ( १) मेच्युप० & । ७ । मरद्राजण०। १
{ (२) विष्णु० मा०। (4
# (३) याज्ञ० । सायन । 4 ॥
1 ( ४ ) अथवेण० । =
ष (५) उव्वट० । सायन० | १
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गाय्ञ्यथैः । (७७)
© । 4 ॥।
संस्कृतम् । 1
( १) कमेयन्ञसहसरभ्यस्तपायनज्ञे विरिष्यते। ¦¦
तपोयक्ञखहस्चेभ्यो जपयक्ञो विरदिष्यते ॥
जपयज्ञसदस्ेभ्या ध्यानयज्ञो वि्िष्यते। ध्यानय-
; ध ज्ञात्परो नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम् ॥ ६॥
| यः
(२) यः शञ्दश्च थदित्य्थे लिङ्कव्यत्यथतो
भवेत् ॥ १॥
॥ (३) य इति लिङ्गव्यत्ययः यद्धगेः यः भगं
$वा॥ २॥
(4 भाषा ।
¶ हजारों कमयज्ञसे तपयज्ञ विशेष ह ओर हजारों तप-
4 यज्ञसे जपयज्ञ विशेष द॑ ओर हजारो जपयक्ञसं ष्यानयज्ञ
“श विरोष ह-ध्यान यज्ञपते परे कारे यन्न नक्षिं है ध्यान ज्ञनकां
साधन है ॥ & ॥
+ शिङ्गक्यत्ययसे "यः" शब्द् “यत्' होजाता है॥ १॥
छ "यः" दाब्द् लङ्ग व्यत्ययं 'यद्धगः' बना वा "यः भगं
वन! ॥ २॥
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( १ ) लिगपुराणपूर्रद्धं अध्यायऽ<इको० १२-१४
( २ ) लोहित्यनीरुकण्ट० । भरद्वाज ° उव्वट० ।
( २३ ) योऽ याज्ञ ० सरट्राज० सायन ० । महीधर ० ।
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(1१८ गधिनानलूलाशनपस्करः ।
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१ संस्कृतम् ।
अनतिः
॥
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1
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{ १ ) यत्सत्यज्ञानादिटक्षणप् ॥ ३ ॥
~~ | + कक
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$} < 7
ई प्रत्य १- ८
„१ (२) यः प्रत्यथूपः॥ ४॥ ह|
(*) (~ म 4
८ (३) यः सावेता देवः ॥ ५॥ ८
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ष्य व ४
४, नः
( ४) नः अस्माकम् ॥ १॥
( ५) नः अस्मदीयाः ॥ २ ॥
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५^-+& धू
<= ४५.
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भाषा ।
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+ = ११
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जौ सत्यन्नानादिरूप व्ह्य हे ॥ ३ ॥
जी जीवात्मरूप दै ॥ ४ ॥
, जो सविता देवै ५॥
"नः काथं हमारादहै॥ १॥
ल
~ । रि । + ~
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६ (५.६4 © * ७ ५
^ नः! काअथैहमलेर्गोकाहे॥२॥ 4
२ ५ + -----------------------~- ~ ~ 4 [६
4
{१ (१) विद्यारण्यस्वा० ।
न (२) निणेयकल्पवल्ट्याख्यसै० भा०
(३) सायन० महीधरण०
ॐ (४) सायन० महीधर°
, (५) तारानाथतकंवाच०
(व 6
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॥ गायञ्य्थः । (५७९)
¢ ध गता दि किक क थ 4 द्ध
; प्रचोदयात् । र
४२) प
|] सस्कृतम् । ५
(१) चद्-प्ररणे प्रकषण चोदयाते प्रयाति ९)
९. ५ ¶
& (रोघ्ररथति, अयमाशयः-सवस्यारंचतनाया
$ अचतनचेतनोऽपि भगवादचात्र पतिभ्ररयति॥२॥
८ च
(३) योजयति घमाधंकाममोक्षिष्वस्मदादीनां `
( क
1
बुद्धिम् ।॥ ३ ॥ £
~~~ > #
व. ` 4 -4
< 999 ~. ४ +
[1
न
रे क ->-
भाषा । |
, व्वुद्, धातु पप्ररणा' अर्थम है । अच्छीतरहतते प्रेरणा
करने 'प्रचे(दयात्' इअ! ॥ १ ॥ ४
@ व्रेरयति' का यह आशय है किं सव अचेतर्नोके अचे- &
(>
तन्यको चतन्य करनेवाला भगवान् यहा प्ररणा करता {र
ह ॥ २॥ ४)
2 ५ हि
21. ~. |, 49 ५
# ॥ 7
- ‰ ©
# र (~
>4 ~.
=°
५
©
|१
८: "==
धम? अर्थ काम, मोक्षम हम ठोगोंकी बद्धक युक्त \,
करता दहे ॥ ३॥ ^
- + -
८ तः र ----------~-~-- ४)
(१) सायन० । महीधर० योया महः ८
(२) विष्णु मा ४
( ३ >) भारद्वाज० योगियाज्ञ ° । स
& + व (64.80 "418 विपि 825४ गोर र ५
-
कै
क शह ० 9
ह 1, |
~ 4 €
( १) प्रचोदयात्-प्रकषेण प्ररयति सकर ८
कृमानषछानपवणा उष्कमविमखादचास्मदव्च
६ + केरोति ! अन्तःकरणवृत्तीः भकारायाति वा ॥४॥
च ~, -4 # १ <
ग
| 1 ४ =
टि € )
@.) | 1 9
श (८० ) गायज्ामन्ाथभस्करः॥ ५
€ [7 व वा त 9 व 2
: संस्कृतम् । १
4
४
- त्त
१1 ५
1 ॥
ए
त
+ (२) प्रचोदयात् भ्ररयतर् ॥ \५॥ ध
१ १
~> षः
५ इ°यो -याज्ञवस्क्योक्तगायत्रीमन्ाथः। ५
४ , तच्छब्देन त॒ यच्छब्दो बोदव्यः सतत बुधः ।
५ उदाहतं तु यच्छब्दे तच्छब्द उदितो भवेत् ॥१॥ ध
क ५
४ घा ।
भ ४
् प्रचोदयात् = अच्छी तरहसे सम्प्रणं कमानुष्ठानकं सन्मुख ध
५, ओर इष्कम॑से विसुख हमारी बउद्धिको करता हं अथवा &
५ अन्तःकरणकी ब्रत्तियाको मरकाशच करता दै ॥ ४॥ ५
५ रेणा कर ॥ ९ ॥ 1
५ ४
† तत् शब्द् जहां हो वहां यत्र शन्द्.भीः बु्धेमानाको {4
।{ सदेव जाननेयोग्य है । ओंर जहां पर "यतु शब्द् कहा 1
4 गया है वहां पर तत्! शब्दका भी बोध होता है ॥ १॥ र
( ९ ) तेत्तिरीय- सन्ध्या भा० गुऽ ४ प्र ५२, ५३ 4 ५
& 94 (4904 1-41-44 4764 4
शि 9 सि 4 ~
भु ॥
, फक ~+
क
[°
र गायच्यर्थः। ` (८१) ५
६ संस्कृतम् । ्
& सविता सवैभ्रतानां सर्वभारवारव सृथते। = ¦
^ सवनास्प्ररणाच्चेव सविता तेन चोच्यते ॥ २॥.
रेण्ये वरणीयञख संसारभयभीरभिः । ५
4 आदित्वान्तगतं यच्च भगाख्यं वा सुसु्चुभिः॥२॥। (4
^ भ्रस्ज पके भवेद्धतुयस्मास्ाचयते दसो । `!
> भ्राजते दाप्यते यस्माजलगदन्ते हर्त्यपि ॥९॥ ¦;
& दीव्यते कीडते यस्मप्रोचते दोतते दिवि।
{4 तस्म।देव इते भ्र क्तः स्तूयते सवेदेवतेः ॥ ~+ #
भाषां । &
सविता सष भरतोंके सब भार्वोकों उत्पन्न करता € । &
८ ~
रन
त्पन्न तथा मरेरणा करनसे सविता नाम कहा जातां
3610169८
८2१ €,
।
॥ २॥ 4
ससारके भयसे डरे इए जना ओर सोक्षका इच्छ ।
६ वाञेसे सूयमण्डलके अन्तमैत जा भशरूप तेज है वह {+
{ प्राथथना ( भावना ) करेनेके योग्य हे ॥ ३॥
भ्रस्ज धातुका अथे पकाना दे जिस क(रणसं स्वक ५
+ चकाता हे प्रकाश्चेत करता ह तथा अन्तम ससारका नाश त
१ करता है इससे भगे शब्द दुआ ॥ ४ ॥
जो स्वभे ठोक्मृ जिस कारणसे कीडा ओर प्रकाश
~ करता टै तिस कारणसे देव रान्द् कहागया है जिसकी ^|
, स्तात् दवता खग करत् ह ।९॥ ॥
0490087 0
प
गि 3 र --2
~~~
कन
भच = ध्र 9] । 94 क ० 4 ~ + रं
{ब (नै
{द ( ८२) गायज्ञामन््राथेभास्करः । ४
न न
& ९
>, सस्कतम् 1
उः = १
~ देवस्य सवितुयच्च भगमन्तगतं विभुम् (ल
(+ बह्मवादिन एवाहुवेरेण्यं तच्च धीमहि ॥६॥ +
नतथामो वयस्भगो धयो यो नः प्रचोदयात् । +
म्माथकाममोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः पुनःपनः ॥ ७ ॥
ुद्ध्ोधाधेता यस्तु चिदात्मा पुरुषो विराट् 1
सवितस्तद्ररेण्यन्त॒॒सत्यधमीणमीद्वरम् ॥ ८ ॥
<| .24 1)
क
हिरण्यवण प्रुष ध्यायेम विष्णस्तज्ञकम् । 8
विदनात्सवेभूतानां विष्णुरित्यभिधीयते ॥ ९ ॥ &
८ भाषा, (=
ल
ध
सविता देषके अन्तगेत जो भगेरूप तेज व्यापक है उसी ४)
तजक त्रहज्ञाना छाग वरण्य कहत €) तिंसका हम ध्यान &
करते दं ॥ ६ ॥ |
¢ जो भगे-धमे, अथे, काम, मोक्ष, म वार वार ५
4 बुद्धिकी इत्ति प्रणा करता है उसका हम चिन्तन "
({ करते देँ ॥ ७ ॥ 4
‰ _ जुद्धकता बाध करानेवाटा जौ चेत॒न्यरूप आत्मा पुरुष \.
{1 विराट् टै वही सविता देवका सत्यधर्मवाटा ईश्वररूप तेन
= माथनीयहे॥ ८॥ ५
. उस हरण्यवण। विष्णुरूप पुरुषका हम ध्यान करते 1
2 । सव भूताम् मकश करने विष्णु यह् नाम कहा 1
गया हे ॥ ९ ॥
प्न
ग $र भिः 3 - [~ & ८ |
वद
0-4-40 9.9 6494992
& ग।यञ्यथंः । (८३) 4
&#
८
(न
9
१ मः > मै > मः > (न यो 1 1 12 > 78 212 7 आ = 7 द ` "नर (रण > न > र ~ > च
# +. > 2
पो
। सस्करुतम् ।
¶ अह्यादिस्तस्भपयन्तमेवं हि व्याप्य तिष्ठति
£ पावाणमाणेधातना तेजोरुपण सास्थतः ।॥ ९ ॥
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4 ज्ञाता चोपास्यते सभ्यक् सोऽमृतस्राय कस्पते१२ पर
भाषा। ्
५ ्रह्मांर तृण पयन्त इसी प्रकार व्यापकं होकर स्थिति ~
। [ऋय च 2 ९ । क # +य
& हे! पत्थर मणि, तथा सवेधातुमिं वह॑ तेजरूपसे ,
स 2)
स्थित दे ॥ १० ॥ ५
= 1 =, ९ ५
वृक्ष, ओषधे, आर तृर्णोमे रसरूपसं आर सव
= भूतो आत्मरूपते स्थित दै इस प्रकार विदवरूपते स्थित 4
४ ॥ ११॥ ध
3 >
4 सू््थे) टृदय, अनि, आकाश तथा ईश्वरम एकदी आत्मा
4 पाँच प्रकारसे स्थित है ॥ १२॥ त
(† इस प्रकार जो पुरुष आ।तमाको समे एक रूपसे 1स्थत्
4 जानता ह ओर् जानकर अच्छी तरह उपासना करता दै |
‡ व् मुक्त दजाताहे ॥ १३॥ ५
(र व 06४ ४
# (४ |
6 ~. 0 "9-4-44 ठ ‰
( ८४ ) गायज्ामन्ाथभास्करः ) ८
कक 4 क 4 6 व [11 -*
भरदाजस्मरलयक्तगायन्रीमाष्यम् ।
सस्छृतम् ।
पदानि दंशे मन्त्रस्य तदादीनि यथाक्रमात् । 4
पदं प्रत्यथनिष्पत्तिः स्पश्रन्तु कियतेऽन्र हि ॥ १॥
तदिति द्वितीयेकवचनम् । अनेनाखिख- ट
जगदत्पत्तिस्थितिरख्यकारणभतसपानेषाद् कभ्य- 1
मानं निरुपम तेजः सयमण्डलाभिध्यय परबह्मा- ८
भिधायते ॥ सविताराते षष्ठयककचनःष॒ञ् प्राण- ।
सवे, इत्यस्य धातारेतद्रपभ्र सवस्य भतजातस्य
1
[./
ध
09
= = 97
4
441
भाषा ।
८ मन्म "तत्" आदि कमसर्दस पद् दँ प्रसेक पदका ५ (4
= अथ यहां स्पष्ट करके कहता ह ॥१॥ ¢
„| ततत् यह द्वितीयाका एकवचन है इसे अखिल जग
1“, । १ तकी उतपोतति स्थिति ठयका कारणभूत उपनिषदों काथित
। .^”1*4 [४ हि) : अ
/ । (जा उपमारहित तेन सूर्यमण्डलं स्थित परब्रह्म है, वह
^ कहा गया दे ॥ ` सवितुः यह पष्ठीका एकवचन है धुज्ञ ¢
¢| ¢ घातका अथ प्राणियेकिं उत्पाते करने है इस धाठुका यह ¢
| 4 रूप हे । सम्पूणं प्राणि्योके उतपन्न करनवाेका यह {4
नाम ह ॥ (वु
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#। थध 4 ५- वि: ~ 4; (र +^ न „0 ^ कर ^ व
0 0 विवि व
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276 £ 4144 ४1004154 6 1 = =
‰ गायञ्यथेः । ( ८९ )
(6
नि
ं सुस्कृतम् ।
च् °
ध रण्यं वरणीयं मरथनीयम्, नियमा.
भिरपगतकरमेषेः सततं ध्येयम् ॥ भगः ॥ ५
५ भञ्जो आमदने-ृज्ञ भर्जने, इत्येतयोधातोभ
(! जतां पापमजनहैतुभ्रतमित्यथः । भा दीतावित्यस्य
4 धातेवां भगः तेजं इत्यथः ॥ देवस्य वृष्टेदना- &
विगुणयुक्तस्य निरतिशयस्पेत्यथः। दीठ्यते भकाः &
¢ रास्वात् ॥ धीमहि ध्ये-चिन्तायाभ् निगमनिरुक्त-
+ विथाह्येण चक्नुषा ये(ऽक्तावारत्ये हिरण्मयः पुरुषः 4
' सोहमिति चिन्तयाम । | 1
| भाषा । | 1
प वरणयं) वरणीय प्रथेना करनयोग्य ह पापर्हित पुरपति 8.
नियमपूथ॑क सदेव ष्यानक्े योग्य रहै ॥(भगः-मञ्जा अम
दैने ' भज्ल भजने' इन दोनों धात॒ओंसे भजन करनवार।
५ पापनाद्च करनेका देव भगे ह अथवा भावात दपि
अथेमे 8 इस धातुसे "भगं" ( वेज ) वना. । देवरथ
| दानादि शणयुक्त निरतिशय ( आनन्द ) रूपका ५
अर्थे टै । प्रकाशरूष हाने "दीप्यते शब्दका मधाग
“4 हुआ । ीर्मि-ध्ये धातु चिन्तन अर्थम है इसस नगम
कै निरुक्त विया्पी नेसे जो यह आदित्ये हिरण्मय
¶ परुष ९ वह मदर एसा चिन्तन करता दर ।
69.
1 ४
ॐ (८६ ) गायक्नीमन््ाथभास्करः |
॥॥ र 4 च¶ ग
संस्कृतम् । ॥ |
धियः इति द्वितोयाबहुवचनम् ॥ यं इति 4;
% छान्दसतािद्व्यत्ययः । यत्तेजः सविदेवस्य वरे - 1 |
ण्यमस्भाभेः अभिध्यां भर्गा-जपतां पापभञ्जनहे-
(के 4
तुभ्रतं धामाहे उपास्सहे । तत्तजो नोऽस्माकं धियो
श
= बुद्धीः श्रेयस्करेषु कर्मेसच भवोद्रंयात् बररयेदिव्यथंः ‰.
८ इति ॥ | <
| 2 [1 $ कि
अगस्त्योक्तटोकः |
नः = [, 9 ® अ (0 ¢= ० ५
~ यो देवः स॒विताऽस्माकं पियो धमादेगोचराः। ^
(# +र ५.9 ५ ५
ब्ररयेत्तस्य यद्धस्तं वरेण्यपुपास्सहं ॥ १ ॥ ध
् । - {
= १ भाषा ।
| धिय;=यह द्वितीयाका वहुवचन > 1. यत् )
छन्द. हानेके कारण लिङ्ग व्यत्यय दै, जो साता देवा
¢ तेज (भगे) हम ससे प्राथनीय दहै ओर जप करनवालोङ्के 4
4 पापके नाश करनकादैठ है उक्त तेजकी हम उपासना ५
9 करते दै । वह तेन दहमं छोर्गोक। बुद्धिके। उत्तम कर्मे ५
4 करनम प्रणा करे । शति । ्
प. जो सविता देव हमारी बुद्धि धपरदिमे लगाता 4
4 ह तिपतसविता देवका जा राथनयि भगेकूप तेन है 4
च उक्तकी हम उपातना करते हं ॥ १॥ ५
( 9 0 9 0 त 1 4 क: ज ध ॐ (4 9
५
1
१ + 1: गा 78.470 8५६; गन 9709190 ह =
शः (४५ ॥. £
+
प सहत्पारशरोक्तररोकः। ।
3 ५ ध
५ संस्छृतम् । ध
£ देवस्य सवितुभे्गो वरणीय धीमहि । |
८ तदस्माकं धियो यस्त॒ बद्यत्वे च परचोदय।त् ॥ १॥ ५
५ स्कान्दीयसूतसंहितोक्तमन्वार्थः।
4 थो नोऽस्माकं धियेचत्तान्यन्तयामेस्वरूपतः ।
8 प्रेचादयासेर्यच तस्य देवस्य स॒वरताः॥ १॥
[¦ दीखस्य सर्वजन्तूनां पत्यक्षस्य स्वभावतः । +
$ सवितुस्स्वादमभतन्तु वरेण्यं सवजन्तुमिः ॥ २ ॥ &
(, भजनीयं द्विजा भगेस्तजश्चेतन्यलक्षणप् । ओ
3 तच्छड्दवाच्य सवज्ञ जगत्सगादिकारणम् ॥ ३॥ सु
६ भाषा। 1
&
; सवरितादेवका जो भगैरूप तेज वरणीय टै उसका दम {4
¢ ध्यान करत ह सा हमार बुद्धिको जह्यरूपमें प्ररेणा क२॥१॥ 1
१ हे सुत्रतद्विजरोगो ! अन्तयामी रूप हम सवर चित्तो ५
/* प्रेरणा करता है तिस ॥ ९ ॥ |
प्रकाशमान, सवजन्तु भमिं परतक्षरूपसे स्थित सविता- {4
४ रूप परमेश्वरका स्वरूप सवेजन्तु करकं ॥ २॥ छ
4 भजनीय, जो भगे तेज, चेतन्यरूप तत् शाब्दका वाच्यः ५
¶ सवन जगतत्कं उरत्पात्तका आदि करण ॥ \ ॥ ल्
न + ¢ # द. ॥: 1 ¢ 9 ` १ & गुध§ (- + श ् 6८44
(1
(८८ ) गायन्नीमन्बाथेभास्करः ४ |
1
सस्क्ृतम् | धु
¢ स्वमायाराक्तिसभिन्नं रिवरुद्रादिसक्ञितम् ।
: आदित्यदेवतायास्तु श्ररकं परमेदवरम् ॥४॥ 4
4 आदित्येन परिज्ञाते वयं धीमद्यपास्महे । 1
लाविःयाः कथितोद्यथः संय्ाहेण सयाऽऽदरात्॥५॥ ॥
अभ्रियनिर्वाणतंनोक्तमन्वरर्थः।
% उयक्षरात्मकतारेण परेशः प्रतिपाद्यते । 4
¦ पाता इता च सखष्टा यो देवः भक्तेः परः ॥ १॥ 4
भाषा ।
स्वमायाशक्तिस् शिवरुद्रादि भिन्न भिन्न रूप, सूथं नारा- (4
‰ यणका प्रेरक) परमेश्वर ॥ ४ ॥ ।
सू्थरूपसे ज्ञात, उसकी हम उपासना कसते हे सं्तेपते “+
( गायत्रीका अथं भने आद्रपूरवेक कथन किया हे ॥ ९॥ |
६4
।{ . ्यक्षरात्मक तारक प्रणवरूपसे.परमात्मा प्रतिपादित है !\ `
4 जौ देव प्रकृतिके परे है वही पाटन करनेवाला नार करन- 1
वाला ओर उत्वन्न करनेवाखा है ॥ १॥ ५1
0 9 (1. द
+ १0449904 0. ><
गोयञ्यथः (८८९) &
वि भि ध
५
सस्कृतम् । धु
असो देवि ोकारमा त्रिशुणं व्याप्य तिष्ठाति । ` &
< \ अतो विश्वस्य बह्म वाच्य उ्याहृतिभिखिभिः॥२॥ ।
(4 तारव्याहतिवाच्यो यः सावित्या ज्ञेय पव सः ।
^ जगद्रपस्य लाधेतुः संखष्टुदीव्यते विभोः ॥३॥ ५
‰ अन्तर्गतं महद्चोँ वरणीयं यत(त्माभेः ।
।! ध्यायेत्तत्परं सस्यं सवव्यपि सनातनम् ॥ ९ ॥ }
1 यो भगेस्सवेसाक्षी च मनोबुद्धन्द्रयाणे नः ।
५ धर्माथकाममोक्षेष प्ररयेद्िनियोजयेत् ॥ ५॥ 4
६] भाषा । ५
६ बहौ परमेश्वर तीनां ठोकोका आसा तीनों शणोमि +
क)
# इ
= व्यापक होकर स्थितै ईस कारण विश्वमयं ब्रह्म तीनों ०
५ ठ्याद्यतेयाका वाच्य हे२॥ दः
, 4
^:
=
च॒ मण म्याहतिका जो वाच्य है बही गायत्री मे्से ज्ञेय & ``
५ ( जाननेयोग्य >) रै । जगतरूप, खशिकर्ता) सनातन जद्यक।
१ प्रकाश करता ॥२॥ 9 |
1 अन्तगेत जो महान् तेज ह वह इन्द्रधाजत् पुरुषस ८
{ वरणीय है तिस परम सत्य) सवेव्यापी, सनातन ब्रह्मका
२ ध्यान करे ॥ ४॥
^ जो भ सर्खष्टिका साक्षी है वह हमरे मनं इदः (
£ इद्द्रयोको धै, अथै, काम, मोक्षम युक्त करे ॥ ५॥
|
स
(8
2
(+.
2
+ (९०) गायीमन््ा्भास्करः। ४)
क व 1
उट माष्यम् ।
संस्कृतम् ।
तदिति बष्टया विपरिणम्यते तस्य सवितुः
नौ +
& स्वस्य प्रसवदतुः आदिस्यान्तरपरुषस्य देवस्य १
, दिरण्यगर्भोपाध्यवच्छिन्नस्य वा विज्ञानानन्दस्वमा-
ध वस्य वा ब्रह्मणा वरण्यं वरणायथ अगः मग
राब्दा वायवचनः वरुणाद्ध वा अभिषचनाद्धगो-
ध पचक्राम वीय वे भगं इति श्ुतिः। तेन हि
पाप अरखन्ति वहन्ति भजी भ्न अथवा
& भगस्तेजोवचनः यद्वा मण्डटं पुरुषो रद्य «4
)
८२
£ इत्येतचितयमभिघेयते देवस्य दानादिगणयक्तस्य 4.
भाषा {५
~ तत् शाब्द षष्ठवथंमं दै तिस सातारा अर्थात् सचके ५
¢ उत्पन्न करनेवाछे सुर्के अन्तगेत पुरुष देषका अर्थात् दिर- `
(4 ण्थगभोंपाध्यवच्छन्न विक्ञानानन्दृस्वरूप ब्रह्मना वरणीय रूप
¢ भम॑ है भगं शड्द वोधवाची है भगंक। प्रभव वश्ण अथवा ।
/, अभिषेचनं आ । निश्चय करके वीयही भग॑ हे यह श्चति ५
४ तिससे पापनष्टहाति ह भजीधातु भर्जेनार्थक टेनिस 4
‰ भगं तेजावाची द अथवा मण्डल) पुरषं, ओर किरणं यह 4
क तीनों भगशब्दति केगये ह देव दानादिगुणधुक्तङा हम
~+ ^ [~ ~ नर्व क ४
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¢ गायच्यथंः । (९१)
| नि कि 04 04 0 न; 0 04.774 ^^ ~ 3,
|
धीमहि । ध्ये चिन्तायाभू्,अस्य च्छान्दसं सम्प्रसार ध
णम्, ष्यायासः चिन्तयामः निदिध्यासं तद्विषयं ~
कमे इति यावत् धियो यो नः धीशब्दी बुद्धिव चनः +
करसमवचनो वा वाग्वचनङ्च बुद्धीः कमाणि वा |
वाचो वा यः सविता नोऽस्माकं प्रचोदयात् ।
यस्सविता देवः नोऽस्माकं धियः कमोणे धम्।- &
दिषिषया वा बुदीः “चोदयात्” भरेत् “तत्”
तस्य-चद सओदने पकषेण चोदयति भररयति तस्य ~
सवितुः सम्बन्धि वीयं तेजो वा ध्यायाम इति ¦
1
ठ 1 ~, ५ ~ ~ ¬= 1
4 [र “ ५९ ट: {
4 [1 +। (क) 21 ॥ [* 41 |
(७ 0 = क 11 ८ 1 = 4 4 ८. ~<
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य
> 0-०-5० न° €>)
भाषा ।
ध्यान कसते देयैः धातु चिन्तन अमे र, रेदिकः प्रयोग
होनेसे इसका सम्भरसारण दै ध्यान कस हैँ ( चिन्तन करते श `
है) अर्थात् ब्रह्मविषयका निदिध्यासन करते ह । “धियो { ;
यो नः" यहां धीश्चब्द बुद्धिवाची वा कमैवाची व। वाग्वा 4
हे रस् छेये जा सूये हमारी बुद्धि कमे वा वांण।क 4
|
| र
ध प्रेरणा करता है जो. समिता दैव हमारी बुद्धिका
धमादि कर्मेति प्रेरणा कशता है तिप्के । ' चुद्
‰ धातु-प्रेरणाथक दै जो अच्छी तरहसे प्रेरणा कर ५
तिस सविता देष सम्बन्धी पीये वा तेज ( भगे ) का
8605
तैत
१९444404 74 10104446
व ८
ष ( ९२) गायज्रीमन्बाथभास्करः „
[श + ४ | ^
।६) सस्कृतम् ।
24
।
१,
"५ भवति ! लिङ्कञ्यत्ययेन वा योजनः, तत्सवितु
॥ <-> ^ +
4 वेरणाय भग। देवस्य ध्यायासः धिया यद्धगः (|
अस्माकं बवेस्यति॥
दयात् ब्रेरयत्यस्माकं तं च ध्यायामः स च सवितेव
©
~
< 101 ,
छ ~<
ए "व भ
पयनमाष्यम् ।
>
“ सर्वासु श्वुतिषु घलिद्धस्य देवस्य व्योतमानस्य
“ सवितुः । स्वान्तयामितय। म्ररकस्य जगस्खष्
(त भाषा ।
हम ध्यान करते द यहं सम्बन्ध है । अव वाक्यभेद करफे
योनना करते हँ उस सविता देके वरणीय दीर्थं वा तज-
काहम ध्यान करते हज हमारी बुद्धका भ्ररणा करता
है जौ भगं हमको प्रेरणा करता तिक्षका हम ध्यान
करते हें वह भग॑ सवितादी है । अथवा खिङ्क व्यत्यय
करके यह याजना हं तिस सविता देवक वरणीय भगेक।
हम ध्यान करत ह जौ भगं हमारे बुद्धिका प्रेरणा करता रै। 4
(नि ^~ ७ श्भा 4 (विश्वा -> 49 > 0
> च् जं ~<८. ॥ = ए. <) ह. ध क (¢.
(८4
~ सवश्चतियोमिे मरिद, मकाशमान, सवं अन्तयीमी, {
५ रूपसे प्रक, जगत्की रचना करनेवाला, सवितारूप,
00-00-00
+
ध
<
५१
(
<स:
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५५
८.)
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।
कः
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|
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द
गायज्पः। ( ९३ ) वि
हर मनै > "ब" > > > मि की रय ति तिणि नेषि > शभ ननन क न
संर कृतम् । त
परमेरवरस्य आत्मभतं वरेण्यं संच र५सपतथा ।
ज्ञेयतया च सम्भजनीयम् ॥। भगः-अविव्यातत्काय- 4
योभजनाद्धगः स्वयज्यातिः परबह्लात्मकं तेजः ५८ ्
माहे तोह सस(योऽसो सष्हमिति वय ध्यास्मा)
(6 न
; ( यद्वा ) तदिति भगा वशेषणम् , सवितुर्देवस्य “4
€ तत्ताडक् भगेः धीमहे किं त देस्यपक्षयामाह । य |
इति लिङ्कव्यस्यथः यद्धगो धियः प्रचोदयादिति ह
( तद्धयायेमेति समन्वयः ॥ +
[; ^ भाषा । 0
४ परमेश्वरका अ।सरूप ( वरेण्य )8व करके उपासन ज।नने ~
श अर् भजन करत चागय भग ह् अज्ञान जर तिके कायक
जरनेके कारण भगं स्यं ज्योति परबह्यहपातक तज हे । ¢ ४
^ तिपस्का व्यान करतहेजोमद्रू सा बहदहैजोवह € सो ।
मे हरश्स प्रकार हप ध्थान करत द । अथवा "तत् यह् रः
,† भगका, विशेषण दै सविता दषके तिस परब्रह्म संध्यी ^
! भगका ध्यान करता द्र तिस किस इसको कहते ह 'य' “4
६. यह् रङ्ग उ्यत्यय् हज गग हनार बुद्! मरणा करः ४
४ ता ।तपत भगंङा ध्यान करत हं यह् समन्वय हे । ५
नितीपीनवदपपकवतकपीतत
` ऋका ~
कै
क 1.
ध
(९४ ) गायन्नीमन्बाथेभास्करः
संस्कृतम् ।
( यद्रा ) थः सविता सया धियःकमाणि षचो-
५ दयात् परति तस्थ खवितः स्वेस्य पसरितदै वस्य
+ द्योतमानस्य सयस्य तत् सर्वेहर्यमानतया प्रसिद्धं
$ वरेण्यं सर्वैः भजनीयं भर्गः पापानां तापकं तेजो
मण्डलं, धीमहि ष्येयतया मनसा धारयम ।
रवणमाष्यस् ।
तत् तस्य भगस्तजः धीमहि ध्यायेम चिन्तयामः
अच्र थथ्पि तदेतिपद् भगोवेरेषण नास्ति तथाप
चछब्दवयोगादेव यच्छब्दपरयागों भ्यते तस्य
भाषा |
जो सूयं कर्मक प्ररणा करते दै उस सविता ८( सर्वो
4 सादकः ) देव ( प्रकाशमान ) सूयंके तत् ( वट ) स्रलो-
कृसे प्रत्यक्ष दोनकं कारण प्रसिद्ध वरेण्य ( सवजनोसे उपा-
+ सना करन योग्य ) भगे ( पपके नाश करनवाल।) तजो-
4 ¢ मण्डलको ध्यय रूपमे मनसे हम धारण करते हे ।
तिप्त भगतेजका ५ चिन्तन करतार यापर इस
र ; मन्त्रम तत् पद भगंका विशषण नरींहै तिप्तपर भी तत्
दन्दके प्रयोगस यत् राब्दकी उपरन्ध होती दै। तित्तका
049 ०४9 (व 9 "9 -9 <=--99 = & 9654
+
न +> 4 +>
(> क -- -> (~ कनन वक 94 +
| >+;
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(धः नर
4 ५ <©
(५ प
ध गायच्यर्थः । (९५) श
(= +र क = म मकि ५)
६ संस्कृतम् । ध
९ कस्य ^“ सवितुः” सर्वभावानां प्रलावितुः । पुनः कि- ५
¶ भरतस्य “देवस्य दीषिकीडदियुक्तस्य तं कं यो
५ भगो नोऽस्माकं धियो बुद्धी पचोदयात् प्ररयती- ध
\। स्यथः । तदिह भगेशब्देन बहविधमाहार्म्यभक्तम्।
भ् , सवितूमण्डलगतादित्यदेवतास्वपुरुष उच्यते ॥,
` «¦ अन्न यद्यपि सवितुर्भगं इति सवितृभगंयोभन्नता
|
५
= गायन्नासन्न ब्रतायतं तयाव प्रमाथाचन्ताया ५
सवित॒भगेयोभेदो न विद्यते एव स एव सविता 4
^ स एव भगः सविततृभगेयोः अदैतमेव तथा च राहोः !
1 भाषा । ८
किसका सविताका = सव भावके उत्पन्न करनेवारेका फिर &
८ कैसा रै वह सविता कीडादियुक्तदै ।सो कौन जो भगं <
&\ हमारी बुद्धिको प्रेरणा करता हे यहां तिस भय राब्दस
@ वहत मकारका माहात्म्य कहा गया है वह भगं सूयं मण्ड- ।
\ खेम ( व्यपिक ) रुष् कहा गया इ । 114
५ यदपि इस गायज्नी मन्त्रम सविता ओर भगकी +
भिन्नता प्रतीत हती हं तथापि परमाथ विचारम् }|
+ सकता ओर भर्म मेद् नहीं दैवी सषा द वहां
च भगे ह सविता ओः भगं एकरूप देजेस।
४ दरः ( राहुका शर ) अथात् राह दिर हे यहां षष्ठी
(४ ५। 04428 ऋ ~
> ध
चः ॥ = +& (५ र
किं राह:
न्क
९९५.९ | ~क
०
रभि
$ ---------- क वा मं <~ रै पकं षदे =>
----------
6.
५ (रद) गायन वथेमस्करः) 4
& कि, ५
ध सकय ।
4 । र इ तेवत् षष्ठी स्वरदसधिका पनरपि किष्ेत ,
॥ |
(4 ‰ “: वर्ण्यं प्रवरणीय प्राथेनीयन्)जन्मघ्सयुदुःख '
८ नादेत्य ध्यनन उ गस्लनायामेत्यथः । एव गाय>५(- {4
९ स्तस्य च माहारम्यप्रुपवण्य पुनस्तस्येव महे.प्रभा-
¢. वत्वे महाव्याहतिभिर्विरोषणीभूता।+रमिध्ते ¢
त्यथ किभूतं भगः भूरादि व्थाप्य तिष्ठन्तमिते (त
देषः । तथा च भूरादित्रेरोक्यभ्रकारकम् । भृभर- £
(लोकः भुवः भुवर्खोकः अन्तरिक्ष, सखः स्वर्छोकः
प
भे.भा। ध
न>
व
£ विभक्ति अभद् सम्बन्व क्राधिका दरं वाद यहां >" र
& हे। (तथा राके दारके समान षष्ट। विभक्त भका 4
साधक नह ) । फिर ५ किंसेथकारका वह भगं ६। 4
4 वरणीय है अर्थात् प्रनीय हे जःभ, भ्रत्युरूप इ.खेकि ‡
+ नाशके 1ख्ये ध्यान पूषैक उप१।तन( करनेयाग्य ह । इस 1
प्रकारसं गाय मध्त्रका माद्य वणन करकं (केर
तिका महाध्रभाव महान्यहतिदारया पिदवरूपते कहते 1
¢ है किस प्रकारका वह भर्गहै भ् आदि ठकं व१पक 1
11 होकर स्थित ह तथा भ आदिं तीना ट कंक प्रकाशक दे
= । भूः › भर।मखोक ' मुवः ` अन्तरिक्षलोक, : ;; सगंछ।क
न्द
धु ससछृतम्।
५ षवञ्ुपवपार कमेणावस्थितान् लोकानभिभ्याप्या-
+ वतिष्ठमानोऽसतौ भर्गः एर्तोखीछोकानेव अरदीप- ¢
4 वत् प्रकाशर्यतास्यथः ॥
महीधरभध्यम् ।
.“ तदिति ष्टवे तस्य देवस्य यतिनात्मकस्थ सवितुः
< अरकस्यन्तयामिणो विज्ञानानन्दस्वभावस्य दिर
ण्यगमभपाध्यवीच्छन्नस्य वा आदित्यान्तरपुरुषस्यः
वा बरह्मणो वरेण्यं वरणीयं स्वैः पाथनीयं भगः
स्वेपापानां सपरससारस्य च भर्जनसम्थ तजः
भावा ।
3
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॥ =|
थ नयनम
इसापकार् क्रमसे उपर उपर स्थित तीनों रोकोमं ररेष्रण &
होकर भग॑ स्थित दै अर्थात् इन तीनों लोर्कोका म्रदीपषत् $
प्रकशिक ह । ष्क
(य
तत्› यह् षर अथमे हे तिक्त यकश्चमान प्ररक अत न्
यामी विज्ञानानन्दस्वरूप हिरण्यगम{पाधिमें स्थिति सूय
= मण्डलके अन्तरत पुरुषरूप ब्रह्मका वरणीय नाम॒ सक शु
| मराथनीय जा भ) अथीत् सपर पप तथा सवं संसारके नर क
(अ प = +
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{९ गायर्जामन्त्राथभा<हरः ।
९.271.914. 2
= सत्यज्ञानानन्दवेदान्तप्रातिवा्यं वयं धीमहि ध्य।या-
छान्दसं सश्प्रसारणमभयद्रा मण्डलं परुषा रदम-
य॒ इति यं भगःशब्द्वाच्यम्, भगो वीर्यं वा
वरुणाद्धवा अभिषिचानादर्गोऽपचक्राम वीर्यं बे
भग इति श्रतेः तस्य कस्य यस्तक्षिता नोऽस्माकं
& धियः बुद्धीः कमणि वा पचोदयात् वा प्रकर्षेण
& चोदयति परयति सत्कमानलष्ानाय । यद्वा वाव
& भेदेन ` योजना-सवितर्दैवस्य वरेण्यं भगो ध्या
भाषा ।
43. करनेमं समथ वेदान्वद्रारा रबाणत सत्यज्ञानानन्दस्वरूप
(\ तेजका हम व्यानि करत हं वैदिकप्रयेग दानक सम्प्रसारण
८ ह अथवा मण्ड, पुरुष, करम य ताना भगश्ब्द्क वोाच्प
= टँ अथदा भगं वीय्यद्प हे (वा वरुणरूपस स्वको सिञ्चन
~ करन भगं वीर्यको कहते दै-“निश्चयकरमे भगे वीये दै"
त फेसी शति दै) तिसा किसका ?ज। सविता दारी बुः
{वा कथम प्रणा कवता हे अथवा संत्कम(कै अनुष्टनमं
टै जो सविता दमाय षुद्धिकीं प्रेरणा करता है तिसका।
व) 91944400
ज
| ट यामः यदच नो बुद्धीः बररयति तं च ध्यायः स
4 मटोभांति लगाता दह अथवा वार्क्यभद्तत सजना करते (~
है । उस सविता देके वरणीयं भगका हम ध्यान करते `
‰) ५
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सस्क्ृतम् ।
: च सवितेव । लिङ्गञ्यत्ययेन वा योजना, सवितुदं-
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\\ वस्य तद्धगों धीमहि यो यद्धगो नो बुद्धीः श्ररयतिण ध
८ श्रीमच्छङरमाष्यम् ।
„ तत्र ्द्धगायत्री प्रत्यश्ब्रद्येक्यवोधिका ।
= ध्यि यो नः प्रचोदयादिति नोऽस्साकं धिया
9 = = कि
4 बुःीः यः प्रचोदयात् रस्थेदिति सवैबुद्िसंज्ञातः-
करणप्रकाङाकसर्वसाक्षी = मरत्यगात्मेत्युच्यते \
¶ तस्य परचादयातश्ब्दनिर्दिष्टस्यात्मनः . स्वरूपः
\¦ भूते परं बह्म तत् सवितुरित्यादिपदेनिंदिंदयते ।
भाषा
९ न
५ \ हम ध्यान करते हे वह सविता ही ह । लङ्गन्यत न <
ध करके योजना करते है । समिता देवके तिस भगका देम
4 ध्यान करत जां भर्गं हमारी बुद्धिकी म्रेरणा. कर्ता € ||. ५
थीत
बोधक रे । (घेम यो नः मचोदयात्ः अथात् ज ९ ५
बुद्धिको मरणा करता ₹, अर्थात् सन ` अन्तःकरका ४)
मकाशक) सवका साक्षी प्रस्यगाला कहा जात ९, ५
्रसोदयात् शाब्द करक कथित, .आत्माका स्वरूप परमल ५
"तत्धावितुः ` इत्यादि पदोसे कथित ह । तहां पर ५
(स
४]
163
च तहां शद्ध गायक्ची- जीषास्मा ओर जह्यक -एकताशा
' + + ५
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सस्कृतं । धं
तत्र“ओं तत्सदिति निदेशो बह्यणख्िविधः स्तुतः
र
गि 2.) 26
८
[त वच्छढ्दन बत्यग्मत स्वतः ज्लद्ड धर् बह्यव्य-
^ ते । सवितरिति सष्टेस्थितिषखयलक्षणकस्य सवै
£ प्रपंचकस्य समस्तद्रेतविश्रमस्याधिष्ठानं रक्ष्यते,
¢ वरेण्यमिति । सवेवरणीयं निरतिरायानन्दरूपम् ।
¢ भगं इत्यवियादिदोषभर्जनारमकन्ञानेकविषयत्वम्।
देवस्येति सर्वै्योतनात्मकाखण्डचिदेकरसम् ¦
> सवेतद्वस्येत्यत्र षष्ठयथों राहोः शिरोवदोपचारिक-
= वुद्धथादिसवेहद््यसलाक्षिखक्षणं यन्मे स्वरूपं तत्स
॑ ध वाधिष्ठानभृतं परमानन्दनिरस्तसमस्तानथरूपं
| भाषा ।
ॐ क्त् सत् थहं चह्यके तीन प्रकारके नाम है, तत् श्ञव्दसं
+ सङ् भरतम स्थित स्वतः सिद्ध परबह्य कहा जाता
ह हे सविता यहं उत्पन्न, पालन, भट्य लक्षण बाा
= संप पमरपचक्षा तथा स्वं दवेत मका अधिष्ठान
८
(क्र
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धः प्च
५४7
न. छे
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४ न ॥ ~
१ वरेण्य › यह सबसे म्राथनीय अ।र परमानन्द
= ‹ भगे ' यह अन्नानादिदोषोंका नाराक ज्ञानरूप है ` देव-
स्य ' यह सर्वेका प्रकारारूप अखण्ड) चैतन्य, एकरसं देष
% हे । सवितंरदेवस्यः यहां षर षष्ठीका अथ "राहोः ररः" ४
॥।
श की भांति ओषचारिक दै । बुद्धयादि सवे दस्य पदार्थाका 4 `
र साक्षी रूप जोमेरा स्वह्प है तिस स्वं अधिष्ठान परमा- 4
न)
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८ गायच्यथः । ( १०१)
ज नि न
त् संस्छतप् ।
ह;
क म >> 2 र [>
् एवै सति सह॒ वह्यणा स्वविवतेजडपपञ्चन &
रञ्जसपन्यायनापवाड्ः ।
{$ _ सामानाधिकरण्यरूपमेकत्व सोऽयर्भितिन्यायेन 4
| सवसाक्षषस्यगाद्मनो बहयणा सह तादाल्स्य-
रूपमेकत्वं भवतीति सवातमकब्ह्मबाधक्ा+य 4
> गायन्नीमन्त्रः सम्पद्यते, निमहान्याह तानानच-
+ सथः भरितिं सन्मा््नच्यते वहाते सव नात च
^ यति प्रकाशयतीति उ्यत्पत्या चिद्रू पञ्चच्यत । ४
= सतियते इति उयुसपत्त्या स्वरिति सृष्टं सवनयन
€ णस्ुखस्वरूपश्ुच्यत इति ।
८ भाषा विः
न्द सभअन॒थराहित स्वयेप्रकाश्च चतन्यल्प = 1 &
ध्यान करते है । इस प्रकार बह्मंकं साथ तथ
मिवतैरूप जड प्रप॑च केरे रज्जसप॑ न्याये ११९८० 9
अथात् एकः अधिकरण होने एकरूपता हे । २० हके
न्यायत सर्वसाक्षी भस्यक् आत्मा .( जीवात्मा › त यपर
साथ एकरूप होने एकता सिद्ध दै, इस मकार पाष 9
सैस्वरूप जह्यका बोधक है । तीन महार्याई क दयः प
अथं ६='भूः" इस शब्दस सतखूप बल्य ४ कीर
शिका मकारा ` करता है, इस व्युतपतिसे चत 1
जाता है । "सः भीभकार सबसे प्राथित उरू
कहा जातादरै। | १
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(१०२) गायत्रीमन््राथभास्करः।
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क दो 9 1-94-१ 9 11 4-4-91 ~ क~ क 1 क कन नर+ जभ
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विद्यारण्यस्वामिकृतमन्ताथेः ॥
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च... 7.4
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सस्कृतम् ।
£ तदिति वाञ्नोगस्यं ध्येयं यस्सूयमण्डले ।
१ सवितः सकलोत्पत्तिस्थितिसहारकारिणः ॥ १ ॥
> वेरण्यमाश्रयणीयं यदाधारामेदस्जगत् ।
भगैस्स्वसाक्षात्कारेणाकियातत्कार्यदाहकम् ॥ २ ॥
देवस्य वयोतसानस्य द्यानन्दात्कोडतोऽपि वा ।
धर
ॐ । १९ ् ८: ; 4 ©
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भाषा |
ततु-वाणी ओर मनसे अगोचर जे सू्मण्डरमे ध्यान
रने योग्य है। सवित॒ः-सकर कोकाका उत्पत्ति, पान
र सहारा कारण हे ॥ १॥
वरण्यम्-सवके आश्रय लेनैयाग्य जी इस जगत्क
आधार है । भगैः अपने स्वरूपके साक्षात् करनसे अविया
मीर उसके काथका नाशक दै ॥ २॥
देवस्यपकाञ्चमान वा आनन्दशूपसे क्रीडा करनेवारा
धीमरित्दम निश्वथ करके वचि परमात्मा जह्य है
अभदसिद्धकं दिए ॥ ३ ॥ |
^ रिः ~^
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गायत्यथैः ( १०३)
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संस्कृतम् । ४)
ड
(= व् |
धेयोऽन्तःकरणवृत्तीन्चं प्रत्यक्पवणचारिणीः। .. &
य इत्यिङ्गघम यत्सत्यज्ञानादिलक्षणम् ॥ ९ ॥
नोऽस्माकं बहुधाभ्यस्ताभिन्नभेदहयां तथा ॥
ष्रचोदयलत्रयतु प्राथनेयं विचायते ॥ ५॥ ६
५ मद्रौजिदीक्षितविरचितभायत्र
ष्यम्!
‡ तादेति-ष् पररणे । सुवाति प्ररयताते सवता
^, सयः तत्सम्बन्धि सथमण्डखावच्छिन्नापति यावत् ।
ट नकम
भ
~ & =-<
1 [2 1 ##
(र) ॐ-ल-3 (६
त्रिं 9 पर
१ | भाषा ।
५ धियः = अन्तःक्षरणकी इत्ति अर्थात् प्रस्यगस्मा ८ जि-
+ त्म क ) खन्पुख ` चरूनबाखं ( बुद् ) यः = यहां छिङ्-
४
थ्व ण
५ व्यत्यय है, जो सत्य) ज्ञान ओौर आनन्दरूप है ॥ * ॥
| हमारी बहुत प्रकारके अभ्यासे भिन्नर भद ए ध
4 नवाखोकी, मचोदयात् = मरणा करे । यह पराथना ह॥ ध
{4 तदिति-ष्रू= धातु प्ररणाथमे है सचको प्रेरणा करनबास +
~ सविता अथौतु सुथेमण्डमे व्यापक तेज है । ५
०
` (१०४) गायत्रीमन््ाथभास्करः ।
= 1 क
से वकटक) क् वुकि ङक कि क व कश किक 9 कक 94 9 अ 94
संस्कृतम् ।
ध दीव्यतीति देवःपरमामा तस्य वरेण्यं स्वै भजनी-
॥ ं पियः बुद्धीः भ्रचोद्यात् घररयतीत्यथः 1 बाहुखका
= छडथ ठेट् । टटोऽडारो इत्याडागमः 1 भूः भुव
£ स्वः एते चयो रोका आपि उश्वह्यवेति |
भाषा ।
युक्त रञ्च धातुसे "वरेण्यम्" सिद्ध होता है । अज्ञान
४. वा उस परमालमाका द्[स ( अधात ) एप्रा ध्यानं करता
$ लड्थ ठेर] छटोऽडा ' इस स्के अदुसार आट्का आगम
५९/
₹ ॐकार ब्रह्मरूप हं इहातं ।
वव
८
+ जो सवके प्रकारा करे बह देव परमात्मा है तिस पर-
मात्माका सव करकं चिन्तन योग्य तेज हे, एण्य प्रत्यय
{= काम कमरीदिका नाशक दानमे भगं आसमस्वरूप ज्यात है
च उसका में ध्यान करता हँ ( अथात् ) बह परमातमा मेद 4
द्रः जो देव हमारी बुद्धिको प्रणा करता । 'वाहुटका-
हआ । भरः, मुवः, स्वः यह तीनां व्याह्यतिर्यो तीनों ठोक (6
५१
ध,
(=
८
।
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पः (0
| गायच्यथः ¦ ( ९०९ ) &
षः ह, "रभ णि ङु ङ शङ्कि कन क ५
६ ४
<
व वर९दराजशष्यय् । ११)
|
(| सस्कतेम् । ५
ध नित्यमन्चो व्याख्यायते । तच्छब्दश्चतैयच्छब्दो ५
| ऽध्याहाराथः। सवितुः जगतां प्रसवितुः। सविता वे
( प्रसवानामीरो । उत्तमे रिषे घरसवस्य त्वमेकः &
न इत्यादिश्च॒तेःवरेण्यम्(वृञ् सम्भक्तोः'एण्यप्रत्ययः
च सवषा सञ्भजनोयम्। भगस्तजः भञ्जनादगेःधका
= शाप्रदानेन जगतोबाह्याभ्यन्तरतमोभञ्कत्वादद्धजं ध
4 नाद्वा काराव्मकतया सकरुकमरूरपाकहंतुत्वा्ध-
णाह बृष्टिप्रदानेन भतानां भरणहेतु्वात्। देवस्य च
भाषि ।
नित्यम गायञ्ीकी व्याख्या करता दँ । तत् शब्दके ५
श्रवणसे यत् शब्दा अह्ण हे । सवितः जगत्को उत्पन्न
श करनेवाला सविता सवेखाषटेका स्वमा ह `
सू ! आप खष्टिके एक उत्पन्न करनवारं ई।- यू
रति है वरेण्यम् = एण्य प्रत्यय युक्त च्ञ धठ॒ सम्ब भक २२
न्ट
कंत्यथेमे है अर्थात् सब प्रणि्यौकं चेन्तन चौर्य ६ ।
गैः = भभ तेज है जगत्के बाहर भीतर परकश करनसु तु
अधकारक। नाक टै वा सवजगत्का भजन ( सहार › 4
करनसे भगे नाम ह ।
4
ब
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यि 1
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ध ( १०६ ) गायव्रीमन्तार्थमास्करः । च
क न .
( ष
4 2 श ज
र सस्कृतम् । 1
। - =,
-- , क (+ {2 ~ {4 लो (=. [|
ध तमानस्य धामाहे चिन्तयामः; ध्यं चिन्तायाम् प
८: 4
#
देवस्य सवितुवेरेण्यं । यद्धग॑स्तद्धयायामः आदि-
क त्यमरण्डलान्तवातनं तेजोमय पुरुषमनुचिन्तयामः 4
य॒ एषोन्तरादिष्ये हिरण्मयः परुषः अथ य एषं
\ एतसिन्मण्डरेचिषि पुरूष इत्यादिश्चतेः धियो यो !.
नः सविता अस्माकं पियः इानोपादानविषयाणि ^.
ज्ञानशनि पचोदयात् प्रचोदयति प्रवयति तस्स- 1
रः
॥ वितुस्तद्धरभदि चन्तथाम इति ॥ |
भावा । ६]
वा काटरूपस स्वं कर्मोकं फलके परीपाकका करणं
होनेसे भम॑दे। बा बृष्टि प्रदाने प्राणियाकं पाटनका हेतु ~
होने भग॑ है । देवस्य = प्रकाशमानका धीमहि = चिन्तनं
केरता है ध्य॑ धातु चन्तन अर्थम हं सवेता दृवका बरणीय 14
जो भर्ग ह उस भगैका चिन्तन करता द्र अथात् सू्मण्डल्ऊ
( भीतर वतमान तेजामय पुरषका चन्तन करता हरं । ५
{जो यह प्रत्यक्ष सूयमण्डल्कं भीतर हिरण्मय पुरुष रे 1
जीर जो यह इस तेजोरूप मण्डलम प्रत्यक्ष पुरुष है यई
/ (श्वि ) है धिया यौ नजा . सविता हमारे त्याग ग्रहण 4
4 विषयक ज्ञानोकी मरणा करता है उस सविता देवक तिस |
(1 भगक्रा म व्यान करता ह्र । इति। ५1
व 994
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0444008 $,
र गायञ्यथः । ०७) ४
त
^ तरनयतच्छवाचरस्पत्युत्त ध
मायत्रीवाक्याथः। #
नु सुस्कृतम् । ॥
सवितद्वस्य भगाख्यं परमस्बह्यस्वरूप तेजः चि. ध
न्तनौयं मम हत्पद्मस्थितेनेव भगाख्येन तेजसा
व्रयैमाणस्तदेव भखोकान्तरिक्षरोकस्वगरोकादि- ्ु
# बह्मण्डोदरवृत्ति सचराचरत्रेटोक्यस्वरूपं मम ¢
हृदयमभ्ये वाद्ये च सूयंसण्डरे वतमानतेजसः प्च
एला परलब्ह्यस्वरूषप उ्यातरद्धनात चन्तयलरप
कय्यादात गा० व्याः ॥
<ॐ 4
जाषा । 4
५
क
य
२4; र
~
=
+
सविता देवका भगनामक परबह्यस्वरूप तेज चेन्तन
कैरनेयोग्थ हमारे दृदय-कमटमे स्थित, भगनामकं तेजसे
‰ भरित है, बही भरोक) अन्तरिक्षछाक, स्वगैोकाईे
4 ब्रह्माण्डे भीतर वतमान चराचर चैक क्य स्वरूप हमारे
ध नर
^
4 दद्यमे, बाहर ओर सूयमण्ठडमे वत्तमान तेज दारा एक
| रूप पर ब्रह्मस्वरूप ज्योति भ द दुघा चिन्तन करता इ
(4 जप क्रे ।
44444424
(06678 00001000. ।
ॐ ( १०८ ) गय्ीमन्बार्थभास्शछरः । |
1 (र रि --क-4 + व~ कर +न (रम (क > +कः ५० गिरय > + > गी मीं न्ड + +, ती गें -ी- -छ=+ ) = र (0 ति केकि
ए विष्णुध्मोत्तशोक्तमन्वर्णाथैः ।
सर्तम् ।
कमंन्द्रियाणे पञेव पञ बद्धोन्द्रियाणि च ।
पञथवदान्द्रयाथादरच भताना चत पञक्ष्् ॥ २॥
मनो बद्िस्तथेवाद्मा अव्यक्तङ्च यडत्तमसम्। ~
चता्वेराति एताने गाया अक्षराणे च ॥
& भरणवं पुरुषं विगदं सवग पञचविशकप्र् ॥ २ ॥
न्ड
"पं
यत्परकाशत्मकोद्पत्तिस्थितिखयकारणस्तयमण्ड- `!
© लान्त्ग॑तमोङ्रवाच्यसाच्चदानन्दलक्षणचिन्तनी- 1
अचा)
पाच कमं इन्द्रय, पाच ज्ञान इद्धिय, पांच ज्ञानहन्दि- क
पके विषय आकाञचादिक पंच महाभत ॥ ९॥ न
चि मन; इद्धि जीवात्मा भर जो इन कर्मापि श्रेष्ठ कार-
# णरूप अव्यक्त दं यह चीषीस गाय्रीके अक्षर ( रूप ) हें ।
= स्वं चराचरजो व्यापक प्रणवरूप पुरुषै उसको.
4 पञ्चीस्भा जानो ॥ २॥
00:
निः
ध
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८]
त
| त
रु
# जा धकाशञरूप उत्पात्ते, स्थिति, ठथका कारण सूर्य- ¢
क्क)!
+. ६
# मण्ठलके अन्तगेत उनकारका वाच्य सचिदानम्दस्वरूप 1
=+
.
धन ८ वि गनेर्तो तो ६
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ॐ
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4456 0000694
गायञ्यथ्ः । ( १०९ >)
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ध.
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{ 1 न~ 4 1 0 (7-4-0८.
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१.1 ॥ 118 भः
३ ^ क ॥ क
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संस्कतम् । ५
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¶ यज मे्यादिदोपशथजनसमथवंह्य। तमक वजःय {
। स्मद्बुद्धिवत्तिनियासकमन्तःकरणावच्छिननपत्यगा |
4 स्मभ्रतकूटस्थलक्षणं सवात्मतेजः, तत्परदाजीवथो- ध
6
! सक्ष्यभतबह्यात्मेकभावं चिन्तयामः ॥ 1
धि थं ४
५ विरथः | ¶
,
3 {५ % (ङ 1
{4 गायनासन्वातेपादयस्य प्रणत्रवाच्यव्रह्यलतावेव ||
{क्षया तदादे प्रणवोच्चारणप्र ॥ १ ॥ ४
त शल
१ भाषा । ध
४६) | ३1
(3 चिन्तन करने योग्य, अविधादिङ दोषकः नाशक 4
( समथ बद्लरूप तेजन हे पुनः जो हमार इद तर/ ५ 44
£ अन्तकरण व्यापक ` भत्यगातम कूटस्यलूप भतम 4 ध ५
८३. है । उस परमेश्वर ओर जीवकाः रक्ष्यभूत अथात् बस = ।
(द आत्मके एकरूपका हम चिन्तन करत ₹ । ध्
(4 प्रणववाच्य जहर्ष 4
गायन्न(मन्त्रसं मरतवाय दका पवक
कदने इच्छा करर तिप्त गपत्रीकं आदि णक ४
4 उलारणदे॥ ९॥ क |
(11
१.
{ ॐ
>
। । ५ ५, 4
(न (6 गी
गा -01411-414169
~ <23---54 । ध
अ ज ~+ =< £ 7 1 1
गायक्नीमन््राथेभास्करः । . ५
भीभीम भभम मम (५
संस्कृतम् ! 4
ओ३स् श्रभषः स्वः तदितिशब्देभ्यो दत्तमाधिका- |
(क [७९ कः
रण पाते षणववाच्यं चरोक्योपलाक्षतसकखावि- +
दकस्याधछानभ्रत ` तदवियाण्डःपारस्यतसद- +
| ध , खक्ष्यभ्रतसवेपरिच्छेदरहितसचिदनन्तानन्दलश्चणं (
शुद्धं ब्रह्मोपादेराति ॥ २ ॥ ध
% तथा-सवितुरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहीति शद ध
५ भ्यो मध्यमाधिकारिणि षति चकाशमानोख्ति- `
& ट ज) ~,
* स्थितिरख्यकारणसावेत्रमण्डलान्तगेतव्िन्तनीय
+ भगाख्यसायापहि तंचतन्यश्चरज्ञानमारक्ष्य तदुपा-
+ सनां द्रायति ॥ ३ ॥
{9 ` भाषा)
शु ॐ भवः स्वः तत्! इन शब्दस उत्तमाधिकारके मरति
॥ > प्रणवका वाच्य चटाक्य करके उपरुक्चित सवे अवेया-
= सम्बन्धी कार्यकर अधिष्टानरूप ओर तिस अविदयाके
4 ऊपर स्थित तत्पद्कां छक्ष्यभूत सथपारच्छदुसे रहित
,‹ साचदनन्तानन्दरूप् अद्ध जह्यका उपर्दश £ । । २ ॥
४ तथा-क्पितवरण्यं भग। देवस्य धामहे ईन राञ्रस
पध्यमार्धिकारांके प्रति प्रकाशमान, उत्पत्ति, स्थिति
ठयक कारण, सुयंमण्डलक अन्तगत चेन्तनीय भर्मं
^; नामके साया्ाहैत चेतन्य अर् ज्ञानका लक्ष्म करकं तिस
ईश्वरकी उपासनाको दञ्ञायादहे॥३॥
त।
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संस्कृतम् । ५
ह चो ते काड्देभ्यो ;
\ तथा धियोयो नः ्रचोदया्देति शाञ्दन्या-
4. ऽवियोपावेविल्चिष्टचेतनकू्टस्थसक्षणजीवात्मन्ञान-
< मालक्ष्थ नि छाधिक्रेणं सरति कमकाण्ड बद् 1
~ (रातम् ॥ ४ ॥ 1
4.१ =
+ ठवरुपाधिसेदैलिविधं बह्म निर्दि्टष् । तढ्- &
१९ =,
¦ पाथिनिम॑क्तमेकमेव लक्ष्यते । तथधकाषि भदः ज
८ दभभाहि निषिधं चचितम् । एव तजपतद्य्वाच- धु
6 नयाः परिपाकादर्हवुततिष्तरोभवपूपवक् ठव रभ्य ६।
याकारा वृत्तिरुदेति तदा जीवन्मुक्तो भवात ॥५॥
1 भाषा «4 +
ह उपा- ॐ
4 तथा (वियो यं यो न्रचोदयातुष्न शब्दस् आवया उषा क
८ वियुक्त चेतन्यदटस्थरूप जीवातमा ज्ञानक कर क
ध कृष्ट अधिङ्कारीकं मति कमकाण्डका दस्चाया € ॥ * ^ य
‰ इसे प्रकारसे उपाधिकर भदस तीन ग्रकारका बह्मभद्
7 कल्यगया £ तिन उपाधियसे निर्थक्त ९९९ ह्य लक्षित ९.
६ हे । तथा अधिकारी मेदस कमं, क्स, उपासना, ज्ञेति; तान 1
र प्रकारसं स्ाचत कया गार । इस प्रकार गायन्नार्का =
;{ जप आर उसके अभक भविनाक। पारिपक्त तासं अह्म् ईस
4 दृत्तिके अभावपरक केवल ध्मेयाकोर ( बरह्माक।र ) वृत्ति
| उदथ टोती ३, तव जीवन्मुक्त होता ६ ॥ ^ ॥ ५
न 49348 ४ 1009
ॐ
अनाना त
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(११२) गायत्रीमन्त्राथेभास्करः । ५
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५ भिमतिं ५
त संस्कृतम् । ध
४ षतन्मन्तेण भगवननेताहवपरमाथभूते सां वये 4
4 चिन्तयामोऽस्मद्वुद्धि घमौदिषु घरेरयखिति जीवः {|
4 ८
{प्रार्थयते ॥ ६ ॥ |
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स्ह
परञ्च-यन्मनसि सङ्ल्पादिकं तदवुदिनिशिना-
$ ति तदेव जावातमेन्द्ियद्ारा करोताते नियमायदा
4 तत्प्राथनाभिः घरसन्चशो धममागे बुद्धं पवत्तथ-
& तदा तद्नकाम्पतो जवः शभकाय्यं करोति तेन
£ <:
ध
भाषा ।
ध
हे भगवन् ! इस गायनो मन्वसं एस परमाथरूप आपका
म चिन्तन करता द्र । हमारी बुद्धिको धमादिरिषयोँत
^ आप प्रेरणा कर इस मकार जीव मराथना करता हे ॥६॥
प
नृ.
4 फिरेभीजा मनसे स्कल्पादेक हाते ई उनको बु
८4 निश्चय करता हं ओर जी बुद्ध निश्चय करती हे उसीको
४3 =
/4 जवातमा इन्द्रयद्वारा करतां ह । इस नयमस ज
~ तिस प्राथनसे प्रसन्न परमश्वर धर्ममागमें बुद्धिक्ी प्रेरणा
~ करता दै, तव॒ तसि प्रभश्वरकां द्या करके युक्त जीव
4 शुभ काथेको करता है । तिस गुभ कार्यके करने च
वव
ध्नः
।
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५ गायञ्यथैः । (११३) &
8 | न भी भीभीम ममम भ भीभीम
(| संस्कृतम् । त
सकटद्रितक्षयपर्विंका उटतया परा भक्तिनायते 1
4 तते विक्षिपशमनपूरकं परमास्मज्ञान स्वयुदेति । ५
^ तत आवरणक्षयाजीवन्मुक्तो भवति । तस्मादतः
† परा श्रेयस्करोपासना नास्त्येवेति ॥ ७ ॥ |
५ ^. > ध ््
५. अत्र बाणत्रस्थादीनां तु तन्मेनायन्तस्थवडय(-
# ५ । ¢ ९ वु 4 ~ म 4
. स्सकश्रणवाभ्यां मध्येऽपि "आदावन्ते च यारत ।-
{६ वर्तमानेऽपि तत्तथा॥” सपादो रञ्ज॒सत्तेव बह्यसतते- ।
० ्ः ¦ => 0 = [क
५ केवलम् षपपञखाधाररूपेण बततेऽतो जगन्नाहं 4
4 ॐ
श सकल पापक्षय पूेकं _ दटतर परां भाक्त उतपन्न हती ई, न्
4 तव विके नाश होनेते परमातमा ज्ञान स्वयं उद्य हीता $
क है तिसके अनन्तर आवरण क्षय हान्त जिन्त 2५ 8
{ॐ है रस कारण उस गायच्(का उपासनाकै परे कई न
कटय(णदायी उपासना नदीं है ॥ ७ ॥
र,
हस मन्वे चाणभस्थादिकोको इस मन्त्रके आदि ५
९ अन्तम स्थित बरहमरूप प्रणवके हीन मध्यमे भी कहा हे । ~
“जो आदि अन्ते नी रै वह वतमान कारन = नहा,
रै स्फादिकोके अममे जसे रज्जपत्ता द उ। मकार स ।
प्रप्ते बह्म सतताही है ॥ "' प्रप्चकि आधर क्पस ब्रह्म
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( ११४ ) गायोमन्वाथभास्करः।
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१ ) (रमै १ > ° षि >+ 9 9! ०-अ ३ -, ` (र्दी 3॥ +, ~ म "+" ~ नी भव्यम गव्वर भ" न भीः > (र > (र्ण गीर > गन्म 9१ भ्व ° 9 +* ज न्वः ¬+ ग्न्णङम
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सस्छतम् ।
~ इर्यादिवाक्येभ्योऽन्यथाख्यातिमायिकमेदनिरस-
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4 नपवेकेण बह्येव सचि तस्भवाति ॥ स
४ गायत्नरीजपमहत्वम् । ॥
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{‡ गायञ्खा नं पर ध्यान मायन्या न पर इतम् ९।
ध ( २ ) यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मः यतो जपयन्न प
बोजादिवधा न सम्भवति ॥ २॥
भाषा
| वतमान ह रस कारण पच नहा है ्ट्पाद् वचनासं
+ अन्यथाख्याति माधेक भद त्पागपूरैक अद्य स॒चित
हाता ह।
गाय्ीते परे ओर फोर जप नहीं ह । गाय्चीसि भ्रष्ठ
क,
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कोहं तप नदीं दै। गायन्नीसे परे कदे ध्यान नहीं हे ।
गायञ्चीसे पर काटे हवन नरी है॥ ९॥
~ सघ यज्ञे जपयज्ञं ह्र । क्योकि यह प्ुषीजादिषै
वधस रहित ६॥२॥
( १ ) ब्रह्मवाक्यम् ।
८ २) मगवद्रीतायाम् अ० । १० इरोऽ २९५।
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जपभेदः। (११९) &
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सस्छृतम् । 1
( ९) ये पाकयज्ञा ्चत्वारो विषियज्ञसमन्विताः । ह
सर्वे ते जपयज्ञस्य कां नाहंन्ति षोडशीम् ॥ ३॥
प जपः । ध
„ (२) जपः स्यादश्चरावृत्तिनिनसोपाश्चुवाचकेः । त
: धिया यदक्षरश्नर्णा वणस्वरपदात्मकाम् ॥ |
उच्चरेदर्थम॒दिदय मानसः स जपः स्मृतः९॥ ९
+ जिह चारुयेष्िचिदेवतागतमानसः । स
५ किञच्छबणयागम्य स्यादुपाद्यःस जपःस्षत
® मन्त्मुच्चारयदवाचा वाचिकः सजपः समृत
| भाषा ६
$ विधियज्ञ सहित जो चार प्रकारके, पाकयज्ञ हे बह जप कर
4 यज्ञे सोरी ककि बरावर नर हं ॥.२ ॥ ह|
ए मन्नकि अक्षरकी बार २ आदति केका जप कहत व
ॐ रं वह जप मान।संक उपाद्च अर् त भृद् 1 1
< तीन प्रकारका है, जिस मन्त अश्षराकां पड्ा्तक। वण-
¢ स्वर, पदयुक्त अभरका उदेश्य कके मनसे उचारण शिया ॐ
& जाता दे षह मानसिक जप क! त 2॥1) दव 1
जिया ओर् ओ कथित् चटा प तगत
(4 लगाकर कत् सनन शभ ४ 0 ॥ म
= वचनसे मन्बका उचारण करना १ ~ | 3 20
(१) मनु०्ज०।२ (श
« (२) तन्त्रतारे। नूर्तिहपुराण भरविष्ुरमोरे च जपमेद् उक्त व
2 (५८
६ ` ।
प 1
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ग 10004544
4 ( ११६ ) गायत्रोमन््ाथभास्कशः (५
(अ वि पि मि मी मी मि मि पि मि म & |
४ संस्कृतम् ! शु
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ॐ ( १ ) बिधयज्ञाजपथज्ञा विरि दरभिगयणः । ¢
उपांशुः स्याच्छतगरुणः साहस्री मान्तः स्मरतः
(4 ।
जपकाढः।
( २) पूवा सन्ध्यां सनक्षत्रामुपाललीत यथावेधे ।
{ गायज्नीमभ्यतसेत्तावव्यावदादित्यदशेनम् ॥ १ ॥
उपास्य पश्चिमां खन्ध्यामादिस्यञ् यथाविधि ।
गायन्नीमभ्यसत्ताववयावत्तारां न पदयतिं ॥२॥
‰ भाष ।
ध विधियज्ञ जपयज्ञ दशणण श्र है, जपयज्ञो उपाच
कसक |
प
८४४.९
^~
थ
% सोगुण श्रेष्ठ है, उपांञयसे मानस जप दजारथुणा श्रेष्ठ है।।४ ॥ ५
+ नक्षत्रोके रहते ह आरभ कर सुयदेवकं उद्यपर्मन्त {+
प्रातःसन्ध्याकर् सावे।ध गायन्नामन्रका अभ्यास करना 4
चाहिय ॥ १॥ {न
दः
च सयं सन्ध्या ओर सुयेदेवकी उपासनाकर जवत्तक ८
॥ तारागण. न दिक्षां पंड तव तक यथाविधि गायत्री मन्व्-
{च का अभ्यास कना चादिय।॥२॥ न
त 1 ५
श्रु (१) मनु अ० २। रलो० ८५० यो० याज्ञ म०५७।१२६। र|
श्रु (२) दारीतसंहिता ४।॥ १८-१९। ध
08808080
(कम ४ 1 हि 6 ग् हि 44 हः गध की 8 ४ ग
जपकालः । ( ११७)
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2
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५.6 चै चै
जपस्थान तद्पटञ्च ।
सुस्कृतम् ।
लनाम
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भका ८. £ द 9] 1
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श्ेञ्े च ताथ च देवतायाश्च सान्या ।
सहस इातकोटानामनन्तं विष्णस्िधो ॥२॥
( २.)कडएचदपि नो विद्वान् गायनीसदके जपेत् ।
गायञयाभ्ेमखी पो्छा वस्मादत्थाय तासरपत्र्
000 4
(0 1
+~ ~;
भाषा ।
4 घरमे जप करनेसे एक गुण फर हे नदाकं तटपर दूना
च फ़ कहा गया है, मोशाछमें सोरण, अग्न्यागार (अग्निहो
ई स्थान ) य सागुणसे अधेके एड ३ ॥ ९॥
# सिद्ध क्च्रभ, तीर्थम, देवन्दिरके निकट सा कराडका
` & हजारशना फर होता दै ओर विष्णुके निकट अनन्त
{ फर है॥ २॥
८, विदान् कभी जछमं गायक्ती न जपे क्योकि गायनी &
६ र ठ ण +"जल्के बाहर 4
(+ अग्िञली कदी गई द इस्ं कारण `जट्क ध
+ ग।यन्ीं जपे ॥ ३ ॥
५ ८१) च्र० योगिया० अ०.७ । ९४२ ।
५ (२) गोभिर
गर्वा गोड रशदतगणसग्न्यागारे राताधेकम्॥२१॥
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११८ ) गायक्रीमन्बाधभास्करः । ध
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¢ जपविधिः । ध
1 संस्कृतम् । ् थ
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८» (श)स्नानं छवा शुचो देशे वद्धा रुचिरमासनम् ।
वे
& त्वया मां हृदि सचिन्त्य सञ्चिन्त्य स्वगुरुं ततः१॥
£ (२)उदङ्मुखःपराङ्मुखा वा मोनी चकाथमानसः। &
‰ विंशाध्य पञतत्त्वाने दहनप्रुवनारोभेः ॥ २॥ 1
¢ मन्त्रन्यासादिकं कृता सकरीक् तिह ।
आवयावयह् भ्यायन्ध्राणापाना {नयस्य च॥२॥
न्
ध.
भाषा । (न
[क ७9 [9३ ५२/ ५
स्नानकर पवित्र स्थानम राचर८( गहु ;) आसन वाध
© (षि १ ~ क > ९ @\ ९५६
तुम्हारे ( पावती ) सहित हमारी ( शिवि ) ओर गुरुकी देद्य-
मे चिन्तना कैर ॥ ९॥ ध
उत्तर या पूव॑मुख हाकर मोन ओर एकाग्रचित्त हो दहन ध
$ प्लावनादिसे पश्चतत्वोका विशोधनकर ओर ॒मन्न्यासादि- ५
वं स ब्राह्मीयं ररर हमार ( दिव-पवती ) रूपका ध्यान
रः करते हृए प्राण अपान वायुको सयत कर जप करना 4
र चाय ॥२॥२॥ ५
& (१) रिव पुण्वधु सैन्जध्या० १२ छो १२२-१२४ |
| ं ( र् ) ११ १) ११ ११ ११ १४८ = ]
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हुए कभी जपन कर् ॥४॥
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मालाम ददशगुण॥ ९॥
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सदृखुण स्फटिकक मालाम द शसदलय `“
मखम छक्षगुण ॥ २॥
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उष्णीषी कंचुको नग्नो मुक्तके मरवृतः 1
४ अपवित्रकसेऽश॒खो विपन्न जपेत्काचित् ॥ ४ ॥
माखकिविरणप् ।
( १) अंगुस्या जपसतङ्ख्यानमेकमेकसु दहत म् ।
रेखयाष्टगणं वि्ादयुत्रजीवेदशाधिकम् ॥ १ ॥
शातं स्याच्छंखमणिभिः प्रवालेस्त् सहस्रकम् ।
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स्कारिकैदैशसाहखमोक्तिकेरक्षुच्यंते ॥ २ ॥
ञ्ाषा।
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पगडी बाँध शर अङ्क! पदनकर नभ्रवस्था१ कर् त
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दख ओर मणिर्पोदी मालाम सत्यु भग
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१०.)
( १२० ) गायन्नामन्बाथभास्करः।
भ संस्कृतम् ।
पद्याक्षेदशरक्च त सौतणः कोटरुच्यते ।
कुरायन्थ्या च ॒रुद्राक्षरनन्तशणतं भवेत् ॥ ३ ॥
( १ ) तजपस्तदथंभावनम्र ॥ ९॥
( २ `नोच्ेजपं चं संयोद्रहः टुयंद तान्तः ।
{ सव्याह्यतिसनस्तृष्णीस्मनसा चापि चिन्तयत्॥२॥
बै (३ ) मनःबहुषण रवं मोन मन्राथाचन्त-
नम् । अव्यय्त्वसनिवद् जपस्तस्पाचतहतवः ॥ ३॥
व् +. 2
कमरगदेकी सारमे दराखक्षगुण, सुषणको मालामें
काव्युण, ्शग्रान्थं आर् रुद्रान्नका मड जव कृरनक्तं
अनन्त फट हाताहे॥३॥
जिस र्का जप करे उसीकं अथकी भावना करता
वु रहे ॥ १॥
4 उच्चस्वरसे जपन करे, आटस्यकां व्यागकेर एक।>
^ स्थानम वाणीको रोककर एकाग्रमनं मत्रका जप करे
^ ओर मनम ध्यान केता रहं ॥ २ ॥
| भरसन्नमन्, पविता, मान, मच्राथ-चिन्तन, चित्तकी
५ एकाग्रता ओर अखेद ये जपके फलके हेतुं ॥ ३ ॥
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८ १) पात० यो० सू० पा० १२८
क ( २ ) अथिपुराणे ।
` (३) व्रह्मा
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जपसख्या ।
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(जि "भी पिं ~ग > नगक गन ॥ > च ¬ कक ¬ क 9 नर+ श ~क
अपस्ख्या ।
संस्कृतम् !
( ९) असंख्यमास्ररं यस्मात्तस्मात्तद्गुणये
ध्रुवम् ॥ ९॥
(२) साविन्नीं सहस्स्वः प्रातजपेचछतङ्चसव
परिमितः कतो वा ॥२॥
( ३ )सहश्चक्ृखः सावित्रीं जपदज्ययसानसः ।
शातद्कतोऽपि वा सम्य््घामायासमपरो यादे ॥ ३ ॥
तठथाहतिपवा च आद्यन्तप्रणवास्वताम् ।
मनसा वा जपेनैव दशछस्वो वरः स्म्रुतः॥ ७॥
शर 49.
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९ विना संख्ाके जप आरी है तिक्तकारणक्त गनत पूवक 44
६। ॥ १॥ ॥
{¦ जप करना आवरयक (५
(| प्रातःकर्म गायत्री सत्र एकं हजार जप जवा ज्ञा बार
अथवा अपरिमित ॥ ˆ २ ॥ र
भटी भांति म्राणायामकं पश्च[त् धक् हजार अथवा साबार १
साषिजीसयच चित्तकी एकव्रत चक जपे ॥ ३॥ 4
सात व्याहति्ोकि सहित गायतन्नाकं जाद अन्तम णव
भी श्रेष्ठ कटा गया ह।॥॥ ॐ
@ 0) पाराश्चरस०ज० = =-= 11.) | १। |
(२) बोधायनधमसूत्र तरर २ अण० स्० १२ ४
( ३ 9 योगियाज्ञर्कध ॥
न & 4 गि ध ।4॥ ४; न 4 नधन
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ध ( १२२ ) गायत्री मन्ा्थनास्करः | ४
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१ ध
व स्स्कतम् । 4
81 वदि
< (\६)कस्पोक्तेव कृते संख्या तरेतायां द्विगुणा भवेत् ।
परं त्रिगुणा प्राक्ता कलो संख्या चतुधुणा ॥ ५॥
नः
५ जाप । ६
& (२) सहश्चपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम् । 4
द गायत्री यों जपेद्धिपरोन स पयिन रिप्यते॥ १॥ (1
(५३) गायत्री विस्तरादिभ्यां पठेदेव्र शृणोति 4
६ वा । मुच्यते सवपपेभ्यः परमभ्बह्माधि गच्छति ॥२॥ ॥
9 भाषा । |
@ सतथुगमं शा्षोक्त संख्या, तेतामे उखका दना, द्रापरमे 4
& तिन, कटियुगमे चौना जप करना चहिये ॥ ९ ॥ ध
~+ गायत्री देवीका हजार वार जपश्रेष्ठ है सौ मध्यमहै |
् दरानिक्ृष्टहेश्स रकार जो गायत्रीक। जप करता है !
2 वह् ब्राह्मण पापस लिप्त नीं होता है॥ १॥ [१
##कृत्ण
=
४ ध
घ
६) जी पुरुष वस्तारप्ूवक इत ददनव्य गयन्नक्रा जपना ६
{८ श्वण करे वहस्व पार्पोसे चछरट कर परब्ह्मरूप
+ हाजाता दै ॥ २॥ 4
८. 1 नि क ( . १.2१
५] कतत £
८, (१, वेशेपायनस° 1
् (२) अत्रिष्ृ०अ० २ इखो०९, ध
८. य
(+ (३, ब्रह्मवाक्यम् । ध
9 नर्न ८.
04 444.
( हि "(4 "] 74 9 749 94 "8
०
जपफरम् । ( १२२)
८ रि
> ए ८ ॐ.
संस्कृतम् । ध्
( १९ › जयपनिष्ठो दिजः भरेष्टोऽखिखयज्ञफर 4
4 लमेवासर्वेषामेव यज्ञानां जायतेऽसौ महाफल भार॥
८ ८ २ ) दराभिजैन्मजनितं शतेन च पुरा कृतम्। 4
सहस्रेण तिजन्मोस्थं गायची हन्ति दुष्कृतम् ॥९॥ `
८ ३ ) गायत्रीं संस्मरेष्योगास्स याति बह्मणः ५
पदम्। गायन्रीजपनिरतो सोक्षोपायं च विन्दति\। |
भचा
©
89
~
भ्द्ः
च
१४
मै
ऋक 1
भका =
जपने निष्ठादाडा द्विज श्रष्ठ है ओर समस्त ॒यज्ञक 4
पर प्राप्त करता है) सव यज्ञम गायत्री मन््रके जपका ^
मरहापएड र ॥ २ ॥ ।
६ दशवार जप करनेसे इस जन्मका ओर संघार जप
ध)
=
#॥1
कृरनेसे पिरे जन्मा ओर हजार वार जप करनेसे तान
जन्मों ( पदे जन्मका, इस जन्मका ओर अगर जन्म ) के ध
4 पापको गाथी नादा करती है ॥ ८ ॥
{च जो पुरुष एकाम्राचित्त करके गायत्रीका स्मरण करता ह
त गायच्ीके जपम निरत &4
वह जह्य पदको भराप्च होता है! गा
~ प्रुष मोक्चके उपायको प्राप्त करता है ॥ ९ ॥
क~ पी
& (१) तन्त्रसार प्र ३९1८ शिवधमं च )
ष (२) व° पारारार सं° अ ` र्खो० ६२ । न
समैः (रेव त्पाराशरसं ०अ ०५ छो ० ७ एराखस्°ज ० १२@ो०।३०।
&& (ध नधः $
1
री
(‹ ९२४. ) गायजयत्ाथमास्करः
चर ॥1
५4
( १ )सहस््रत्वस्तवभ्यस्य बहिरेतिकं द्विजाः
हताऽप्येनसो मासराच्च सेवाहिविभुच्यते ॥ ६ ॥
साविःयाश्चेव मंदरार्थं ज्ञात्वा चेव यथार्थतः ।
तस्यां यदुक्तं चोपास्य बह्यभयाय कर्पते ॥ ७॥
( योगियाज्ञवल््यः )
८ न
2
१4
नप
हत्या स॒रापान ग॒रूदायाभिमषेणम्।
चान्यद् दुष्करतं सवं पृनातीस्याह वे मनः॥ ५॥
भषा।
0404546
प ४
महान् पासे छट जाता हे ॥ ६ ॥
५ गायत्री म॑च्रश्ा यथाथं अथं जानकर उसमे कहे दएका 4
{्
& जो उपासना करता हे ठह बह्महोताहे॥ »॥
व
५.८
4 मनुने कह टे ॥ ९ ॥ `
श्रु (१) मनुर अ० २ दछो० ७९।
4144740 व. (4447-4 ४ ५ &ध 9
जा द्विज य्रामपे बाहर एकान्त स्थानें प्रणवन्याद्ति |
युक्त गायत्रीका जप सदखचप्रार एक महीने तक करता है
ध जेसा स्पे कर्युठीको छोडता दै इसी प्रकार बह सखव ^
शः बरह्महत्या, सुरापान, गुरुपलनीगमन ओर इससे इतर &
४ सगातकु गायन।मनत्रकं जप्रस नश्च ₹बता है एसा ¦
&: (4: > ¦ -&: ° 3 ०० (4 4 ‰ ग & ४७ 0 9 ्ीः
न या
१6 रन १ ता ~ ४ 9 ~< 4 ४ => - ~ ध गु 6
¢ ॥ श्रीः ॥
4 अथं गायञ्यष्टक्य् |
६ संस्कृत्
गायत्री श्रृतिजननी हि बह्मविया
£, श्रीसाङ्ख्यायनसंहगोन्नका त्रिसन्ध्या ¦
¢ षट्कुक्षिः किर जिषदा च पचमो;
| । ~: (९ © नेखिनेन्न €~
~ सञ्भास्या परातेवद्ने जनेलिनेत्रा ॥ १॥
4 साविन्नी रारदश्तांश्ुखक्षकान्तिः
† शु्धखग्बसनधरा भसा सुरद ॥
व्येया सा मणितपनायभूषिताज्गी
ति्थैग्यां रमत उपयेघः ककुप्स ॥ २ ॥
भाषा!
भ-पदमातवा गयत्री है जद्यविचया दे । यह साखी
यन गो्नवाटी चिसन्ध्या ८ प्रातमभष्ादसायङ्का खना › १६ॐ-
# © ~ ~
«<
"~
।^4
1 ८ रे ४ नि च
(9
रै
गिः 4
= क
= रूपा ) पचपौटि ( अधिोक, अधिञ्वाविन्, आवन
=! अप्रज ओर अध्यासरूषवाठी ) मतिवदन तेनत्रा (मात
६ मुख, ध्याता, ध्यान ओर ध्येयस्वरूपा ` ) तिपदा-ऋग्ययु
(८, साम तीन पद्बाटी ) कैर ( निश्चधकरक ) सम्भाव्या
( भावना किये जानेवाखा हे )॥ ९॥
रारद कारक ठक्षचन्द्रमाके सदश कान्तुबा्टा _वतमार्य
तथां श्त धारण करनवार्खा रलकाच्चिनस भू(वतत अगत
उत््र्ट उपोप्तिबा। देवा सातिना ऊपर नचि
दिचाओंमं विराजमान दै रसा ध्पान कर् ॥ २ ॥
स
› 3
~<
4.
५
क्षि ( शिक्षा, कर्प, व्याकरण, निरु त्छ, उन्द् आर अवातः ,
क~
श्र स
668 8 28
ग म
& (१२६) गायन्नीमन्ाथेभास्करः । छ)
8 (~ 4 स 1 ॥5।
१५} सस्कृतय् । ्
& 4
न (कि 9 ५ [ [| |
4 वश्राणा मजाते कमण्डट्ु चे दण्ड- 4
(अ |
(~
मक्षाणां खजमभयप्रदां द्विजानाघ्र् ॥
भ्रीविष्णुत्रियह्यदयां च ब्ह्मभासाः
मग्न्यास्यां गिरिश्चरिखां परां खदाऽऽ्ः ॥३॥
प्रातस्त्वं सवितरि बाखिकाऽस्य भाव्या 4
मध्याहं रिषयुवती जरा घरदोवे ॥
आत्मस्था भगवति गीयसे निशायां
वणोनां खमा गतिप्रदा चतुर्णाम् ॥ ४॥
>+ +~ 4 इ~ = + अ „~
1 $+ ई > =
9१ ~» ¶द् ; ,१ £ 1, '। £
द्य & वरस ट. ध
भा ।
(क
विष्णु जिनका प्रिय हृदय) ज्या छ्खाट, आप्र शख
ओर शिव दैखा द इसप्रकार दवि्जोकी अमय देनेवारी
कृ मण्ड} ३०३, आन्ञमल् धारम केरनवाखा परात्मफा
| गवताकां आप्तजन भजत है ॥२॥
प अ~ >
~~ ^»
००88०
दे माता ! सूथमण्डटम पभरातःकार बाहिका ( जाह्यी )
मध्याद्रकाट युती दोषी, ओर सायङ्काङ वृद्धा ( वैष्णी )
रूपस त् भावना क। जातां हे । तथ। दं भगवतीं ! त्
रामे ( यनक छथ हौनेसे सव क्िरणोकं सिमिट जानेषर
सुषुतिम ) आत्मस्था कंटखाकर ग।इज्ता हे (अत ख )
न त॒ चरा वण।कं( गति दैनेवाखी हे ॥ ४॥
(41440007 42425094 28 2
५
कन
र
५ र
४ गायञ्यष्टकस् । ( १२७ ) 1
क न
५ संस्छृतम् ।
५ मातस्ते भजनमदिन्न आत्मसाक्षा-
५ त्कारोऽरं भवति यथा हि कौरिकस्य ॥
आयाणां ख परमास्मश्चक्तिरेका 4
; विद्धिया जगति चराचरे विभासि॥५॥ 1
अच्यन्नं दवसिति वचः उाणोति जीवः ५
£ पादाभ्यां चलति निरीक्षते पादर्थान् ॥
मातरय्त्किमपि करोति तत्त्वयेव ॥
८. क्षीणां सततममन्तवो भवन्ति ॥ ६॥ &
६ भाषा ।
नर्मः ६
¢ दे माता! तेरे भजनकी मदिमसे शीघ्र आत्मताक्ष-
4 त्कार होता है जिस प्रकार विश्वामित्रको इअ।। आय ५
$ जनो त् अकडी सेतन्यास्िका विया बद्यशाक्ति चराचर ६
५ जगत विराजती है ॥ ९ ॥ (
4 जीव जो अन्न खाता है, श्वास ठता द वचनं सुनता दै ५
पेते चता द, पदार्योको देखता ह अभात् न ऊक ध
& करता है बह तुञचसे ही अथोत् ठक्च शात त ६। सव
कछ करता ददे मता | तुक्का नर नतरां सदैव ध
ण ( श्रीदान, रहत ह ॥ &॥
44४61048 (-- (=
|
वि 09 9)
द त
(4 (4
(१२८) गायञ्ीमन्याथेभास्कृरः 4
संस्कतम् ।
ओंकारस्वमसि ममास्व भुभुवः स्वः
त्रेखोक्यघ्रसावोनि बह्यविष्णरुद्राः ॥ `
यक्किञिद्धवति भविष्यति घ्रभरत
सर्वं तत्वमसि भवानि निर्विंकस्पे ॥ ७ ॥
या वाण्यो मुखकमखादविनिस्सरन्ति
भक्तानां तव पय! भवन्ति सत्यम् ॥
लन्तापक्ष्यकारे पुत्रवद्सटेऽम्ब
कल्याणि प्रय तयश्चः्रदे रसीद ॥ ८ ॥
भाषा ।
द ~ ~ |
(न 4689 ० ~4-~- क - क 352 हिः = 2-गन- ~ £ ® = 0
४० ~ छ नी इ निः
= हं मरीमाता! त् सह्षहेःत् भूः, सुवः सवः तीनों
न व्याहतिर्या है । हे तीर्नोटोककी उतपन्न करनेवादी भवानी ।
¶ द
त हा बरह्या, विष्णु आर रुद्र ह । ह नवङटलपा्िमकै। 4
1 ऊछ हाता ह गा अर् इञा कह स्वत् हाद॥ ७॥
टे पुथवत्सला माता !। भक्ताके सुखाराशन्दस जो ^
गोटी निकलती है वह तश कृपे सत्य होती हे । हे सन्ता- 4
ध $ पको दूर कमेषाटी ! कर्याण करनवारी ! पवि यश 1
देना ! तू प्रसन्ना ॥ ८ ५. |
(49604998
वन - = ~ रः
(& कः ट 8 "8 (अ 6918 ग
ग
६ गायञ्यष्टकम् । ( १२९ ) वु
8) + मव दि 9-9-09) वु वु =
¢ सस्कृतय् । ध.
ॐ | .२२।
£ [क्य <~; <
¢ गायत्यष्टकमिवमायेलम्मते यद् । 4
छ
र)
914 ¢ श
+ भक्त्या तत्पठति सद्ा द्विजः प्ररान्तः॥
5)
[च् # षु
साविन्रोजपफरूमदमुते सलीर च
५ 5 ्
{ जानीते सपाद च रामनन्दनाम्बाम् ॥ ९ ॥ ।
न् श
& ञ्
प भाषा । र
८ &
भ] वि +
५ रस आथसम्पत गायके अष्टककोा भक्तिप्रवक शान्त- चु
+ चित्त ज द्विजजन सदा पदते हँ, वे अनायास ही माय- चं
जके जपका फल माप्त करत है ओर रामनन्द्नकी माता
& ( गायनो ) से परिचित रीतेदं॥९ ॥ ध
१ >
&\ (इति फेजवादीय हिन्द दारैस्कटस्यप्रधानसंस्क्ृताध्यापकेनं ॑
५ श्रीरामनन्दनसहायेन नैतं गायन्यष्टकं सम्पूणम् ॥ र
( ॥ माथस्यपेणमस्तु ॥ ६।
& 10
४ £
॥4 क
१ ५
१५
सवतो (प
गायेत. वावाता
१९
न.
~~~ ~>&८>- 3 द।
1444-9
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ञो [च (=
कि ( ९२०.) गायन्नामन््राथमास्केरः । र
त्न म अ मि मि नि न नरन "+न+ नकन" १
ध ६: ५ & {|
९ थ् € ५ )
| य॑प्राथना ! |
[श ५
ह+ =
{ 317 “+ नित |
(9
६५
५९
संस्फृतम् ।
नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे
जगपरसृति-स्थिति- नाशे तवे †
जयीमथाय अगणात्सघ्रेणे
विरानारायणकरास्मने ॥ १ ॥
यस्यादयेनेह जगलत्ववध्यते
` पवतते चखिखकभसिद्धये ॥
बह्यन्द्रनारायणरद्रवन्दितंः
॥
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भकः ¢
८.५५.
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स नः सदा यच्छतु मंगर रविः ॥२॥ +
५
जगत्फे मुख्य चक्षु, आर जगतुकं पाटन) पोषणं आर २
& टयक कारण ऋग्यजुस्पामरूपः तीना खणो (सत्च-रज-तम) कं ६
र धोरण कंशनेवाट, ब्रह्मा) विष्णु, महकात्मकं जो श्रीसुभदेवं नि
५ उनको नमस्कार है ॥ १ ॥ ,
ध मिषके उद्य हीने संसार जमकर सम्पूण कायातदि-
£ के लियिभरवृतत हेता टै ओर जया इन्द्रः विष्णु, महादेव
4 \ ^ =. नर "०००
ध वान्दत जां श्रसूयदब ह वह सदा हम लागकेो ¶|
मङ्गट दू ॥ 1
(1
0
४ सूयभ्राथना । ` ( १३१ ) 1
ति अन
ध सर्तम् । [।
नमोऽस्तु सयोय सहस््रदमये ध
& सहखशाखन्वितसस्भवार्मने ॥ ध |
श सहस्वयोगोद्धवभावभागिने ध
= सहस्वसख्यायुगधारणं नसः ॥ २ ॥ ४,
(4 यन्मण्डलं दसिकरं विशालं ` द
` ‰ रत्नध्रमभं तीवसनादिरूपम् ४ |
८ दारिग्यडःखश्चयकारंण
४ पनातु सां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ २ ॥ द
[| यन्मण्डरं देवगणेः सुपूजितं ध
9 शिषेः स्तत मावनमक्तिकोविदम् ५ श
ध
क
भरावा ।
अनन्त किरणवारे, तथा सदसा साखाओंके प्रकट कर
वारे, अनेक प्रकार काकि करनबार> एस जो -श्रीसखभदव
‡ हँ उनको नमस्कार हे॥३॥
जिसका मण्डर. महान् म्रकाशचक ओर -रत्नेके. समान
‰ कन्तिवाखाः तीण, अनादि तथा दास्िय ओर इःखोका
+ नाक्च कसनेबाखा है एसे: दरणाय . श्रासु्यद्व हमक. ्रात्
५ त्रद॥४॥ ` ` ::
$ निक्चका मण्डल देवगर्णेसि प्रजित् तथा बलणाः करक
4 प्राधनीय, तथा श्रद्धा करके सुक्ति देनवा्ा है उप्त देबदेव क
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ॐ
)
५
( ९२२ ) गायच्ामन्ताथभास्करः। ष
0 (ष नथ" जरभपवङ्शााशि करक श 0)
म॒स्करतम् । ४
त देवदेवं प्रणमामि सुर्य (1
पनात मां तत्सवितवेरेण्यम् ॥ ५ ॥ ‡
प र पैन
शः)
छ)
श वरणीय जे श्रसूनारायण हं वह हमको पवित्र करं ॥ ७॥
व तद
यन्मण्डलं ज्ञानघनं खगम्यं र्
त्ेरोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् ॥ 0
समस्ततेजोमयदिव्यरूपं ध
पुनातु मां तस्सवितर्वरेण्यम् ॥६॥ =
५ [च क. ` क +|
यन्मण्डर गटमातेषवबाध श्
धमस्य वृद्धि कुरुते जनानाम् ॥ ध
यत्सवपापक्षयकरण च ध
पुनातु मां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ ७ ॥
भाषा। 4
श्रीसूर्यो प्रणाम करता द, बह प्र श्रीसूर्यदेव हमको
पवित्र करं ॥ ५॥ ¢
भिका मण्डल ज्ञानम, अगम्य तीनो कोर पूजनी- |
य, निगुणात्मरूप, सम्पूण तजमियतथा अलाकिक रूपवाला "|
है रसे वरणीय जो शरासूरयदेव हे वह हमको पवि ॥६॥ ॥
जिसका मण्डर योगि्योकि जाननेयोग्य, पुरुषा धर्म- 4
की वृद्धे करनेवाला, तथा सम्पूण पार्पोका नाशक है फे ध
{4
€.
1
4
(६
(
त
॥ लतम् । `,
यन्मण्डक्छ व्याधिविनारादक्
५ यटग्यजुःसामसु सम्प्रगीतम् ॥
६ परकारितं येन च भसः स्वः
£ पुनतु मां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ < ॥
& यन्मण्डर सवेजनेषु पूजितं
4 ज्योतिश्च छुयौदिहं मत्येखोके ॥
धर यत्काटकालादिमनादिरूप
५ प॒नातु मां तस्सवितुवेरेण्यम् ॥ ९॥
त यन्मण्डलं विष्ण॒चतुसुखारभ्यं
॥ यदक्षरं पापहरं जनानाम् ॥
१ भाषा । स
६ जिसका मण्डल व्याधि्योके नाश करनेम श, ऋक) शवः
1.
वि &
=
५ , यजु, साम करकं गान किया दृ, तथाभ्रूखवः स्वः का श्व
8। #, प्रक।श॒कं है एसे वरणीय श्रीसुयभगवान् हमको पित्र
=+ कर ॥ ८ ॥ 4
। जिसका मण्डल सषैजनोसे प्राजत, तथा इस मवुष्यल-
+ कका मकाशचक ह ओर ज। अनार्दरूष तथा कङ्का भी {
| आदिक है रेस श्रेष्ठ सान्ता भगवान् - रमक
१ पवित्र करे ॥९॥ १... (
| र जिसका मण्डर विष्णु तथा - बहाकम सास भर्वात 0
प्राणियोके पापाका नाश कर $
॥ ` © देःजो भविनी तथात
4.८9 "44444
[7 4. १ एव । क कः कक क च क क 7 श पय =. ` कनक ककः = =” वित कतककः तत |
॥ १
| ८; 00004444
८
ध $ (१३४) गायन्ीमन्बाथभास्करः ।
10 |
# रर" र * ~= नन नशि क + भ भ १ भ * ० क -9+ क थ कर न 91 9 भि
सुस्द्तम् ।
यत्काटक्द्पश्चयकारणे ख
पुनातु मां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ ९० ॥
{ई 2.“ ^ ध [न
^ - ~ ~ # 1 रीः 2 -" द - + -¶ च उक
[ ध ५५१ क | 4 1 क न्ब
च" क + ।} (१५॥ ष ४. #१ बद् : 1
श्त ~ ये ॥ |) रै
1
1 ##
9 सः
<: -**+© दशै
& यन्मण्डलं विदवसनां पिद (|
ध मरत्पात्तरक्षपटयप्रगद्मम् ।
ध् यस्मिञ्चगत्संहरतेऽखिटं च । 4
| [4 पनातु मां तस्सवितुबरेण्व् ।॥ ११ ॥ 1
१ यन्मण्डट सवेगतस्यं विषणो-
# रत्मा परं धाम विश्चुदतच्छेम् \ ५
(4; स्मान्तरेयोगपथानगम्यं
है पनातु मां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ १२॥
भावाः 1 थ
रप्र
[3
भि
1.
= नेवा दै ओर जो काठ तथा केटषका नाच करनेवाला ह
({ देसे श्रेष्ठ सुदेव हमको पवित्र करं ॥ १० ॥
= जिसका मण्डल खष्टिकताओमिं प्रसिद्ध, उत्पत्ति, पालन,
१ तथा टयकरमें अतिक्ति-शाङी ह ओर जिस्म सम्पूणं
नु ससार छीन दोजति ह एसे शष्ठ श्रीसूथ॑ भगवानु
(= हमको पावित करं ॥ ११॥
4 जिक्षका मण्डल सर्वर््यावी विष्णुका खूप दै, जो
क परम धाम आर जो सृ्ष्मटदयवालोषे योगमागे करण
& पातव्य है रेते श्रे श्रीघयं भगवान् मको पवतर कर १२॥ ५
~ = 8.
तैः
९ ७ 20 55 ~ 6, ~ 26. 0
(9 09740049
2
[६ सूयप्राथना ( १३५ ) ॐ
सि सि न ५
५-१
तव ` सुस्कृतम् । ५
४
}! ॐ) द्यो तड ल 4 = च ^~ ५ ¶
< न्ड बह्याञड 3दन्त ध
प् गू[यान्त अञ्चरणास्षहसवः ॥ |
{् | ५ => --- ~ । (~~ ८
) यन्मण्डलं वेदविदः स्मरान्त |
श प ५ ङ्घ [ ऋत् © क 0 £ ८
५ पुनलतु मा तत्सार्वतुवर्म्चमर ॥ २१३ ॥ क ।
५ ्। 0 - ~ 1. स
५ यन्मण्डट वदावद्ापमात ४
६) £ ~} 4 ९ & ~. द
८, यद्यागना यागपथानुगस्यद्र् ॥ [र|
|= ५
क = सवेवे ¢ ॐ 1. ९)
। सस्सवेवेय घणमामे सूय
३
भ्ण
[1
= + 9~> &६०
1 (1) 14.) न ।
‡ = 2" +:
~ 2 9 2
9
<== न्नुः
© ~~
{
~+
न +~ ५ र ८
19. ) ॐ
= = क 1.1
नी 7 $> &
~+ च
ष्टः
पनात मां तत्सवितुवरेण्यम् ॥ १४ ॥
भाषा ।
जह्यज्ञानी जिसकं मण्डठका कथन करते हः चारण तथा
सिद्रगण जिसका गान कसते द ओर् वेदवेत्ता गण जिसका
स्मरण करत ड ठेसे प्रेष्ठ श्रीसूय भगवान् हमको पवित्र
कर् ॥ ९३॥
५ ने म च प. 2 ~ नन धि (2 ० त ०8: 5 ध १४ 9
०9. --४ - < 6.+- ० 8८ "9
न त क ^ ह र ^ क
८ 4४
५ -4 | + म ४
7 1 9 ग. - |
ए
‰#५4+--२
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4 ^
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णि 1 ८4 ४.2
~
0 [=]
(16 ° च ¢ ह 9 ¬ 2० &
ॐ>
=)
ध ( १३६ ) गाय्रीमन््ाथेभास्करः 1
(9 ५
ध वेदवेत्ताओनि निस मण्डर्का गान कियाद ओर जो ५
प योगियोद्वारा योग पथस प्राप्य टँ ससे सबके जानने योग्य
¢ शोसूयस्वार्माका में प्रमाण करता द्र । बह शष्ठ श्रनिस्कर (|
4 भगवान् हमको पवि करर ॥ १४ ॥ ` 4
= क
4 इति भाषाटीकासहित गायत्रीमन्त्राथभास्करः समाप्तः । र
3 .& र
५
ध पुस्तके मिनेका टिकाना- {
प खेमराज श्रीकृष्णदास, गङ्ाविष्ण श्रीकृष्णदास, £ ८.१,
‰ शश्रीवेङे्वर'"सटीम्-मेस | “लकषमीकटेश्वर"सटीम-मेस, 1
‰ चब. कल्याण-वंबई्. \
१. ्
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